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चांद सजन सा


दो दो चांद सामने मेरे थे
निर्वाक सी खड़ी थी में।
पूजा की थाली हाथों में
स्पन्दित हृदय लिए थी मैं।

निर्जीव सा था चंद्र अंबर में,
सजीव,समक्ष मेरे खड़ा था।
मनमोहक मुस्कान अधरों पर,
हंसती आंखें लिए खड़ा था।

स्पंदन हीन चंद्र छलनी से
निहार कर, जब सामने देखा।
प्यार छलकाते नैनों से,जीवन
साथी को सम्मुख देखा।

निभृत निशिथ और हम दोनों,
भूख प्यास थी मिट गई मेरी।
पूजन कर आशीष मांगा तब,
लाज सुहाग की रखना मेरी।

ये चूड़ी बिंदी और सिंदूर,
ऐसे ही मुझ पर सजा रहे।

मन बोला,” ये “सजन” चांद है,
दूजा आसमान में बना रहे।”

सुलेखा चटर्जी

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