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अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर विशेष

शीर्षक– बेटी बेटा से प्रिय होती
जब जन्म लिया बेटी ने
दिल तो  खटका होता।
काश! एक बेटा आता तो
इक चिराग तो जलता ।।

रानी बिटिया बड़ी हुई कुछ
सबको बहुत हंसाती,
ता ता थैया बोल बोल कर
ठुमक ठुमक कर चलती।।

घर के हर कोने-कोने में
गुड्डा गुड़िया खेली थी
मम्मी पापा की गुड़िया बन
उनके दिल की हो ली थी।।

खूब पढ़ाया खूब लिखाया,
जो मांगा वह दिलवाया,
अपनी  बेटी के दिल को
कभी न दुख पहुंचाया। ।

बड़ी हुई फिर पढ़ने भेजा
दिल्ली और कोलकाता।
लौटी बिटिया लेकर आई
अपने लिए एक रिश्ता।

मात पिता ने खुशी-खुशी से
  रिश्ता वह स्वीकार किया।।
दोनों पक्षों ने मिलकर के
  शुभ मुहूर्त में विवाह किया।।

जो दिखता है वह होता है
सच्चाई से कोसों दूर।
बड़ी हुई तो प्यारी बिटिया
पर घर जाएगी जरूर।।

आया समय विदाई का
जब ,विकल हो गई बिटिया।
आंसू भर कर देख रही है,
पापा ने क्या-क्या ना दिया?

लेकिन इतना सब देने की
अब कौन, जरूरत आन पड़ी?
बिटिया दो पल सोच न पायी
 आ गई है अब विदा की घडीं ।।

जन्म से मुझको पाला पोषा
इतना बड़ा किया है।
जो मांगा पर सभी दिया है
कभी ना मना किया है।।

क्या मेरा सब पीछे छूटा  ,
पलट के पीछे देखा
कॉलोनी घर द्वार चौपरा,
बिमला कमला रेखा।।

चावल भरकर पीछे फेकें
मां आंचल फैलाये ।
सुखी रहे तू जहां भी रहना
जब भी लौट के आए।।

नाजुक, प्यारी, कोमल बिटिया
सबको बहुत दुलारी होती,
पर बेटी पर घर जाएगी
यही सोच दुख देती है।।

बेटी सबको बहुत लुभाती
फिर भी पर घर जाती है।
बस उस क्षण ही दुख देती है
क्योंकि
बेटी , बेटा से प्रिय होती है।।

पुष्पापाठक

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