
विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कार शेषोऽन्यः।
विरामप्रत्ययभ्यासपूर्वः= विराम प्रत्यय का अभ्यास जिसकी-पूर्व अवस्था है और; संस्कारशेषः= जिसमें चित्त का स्वरूप ‘संस्कार’ मात्र ही शेष रहता है, वह योग; अन्य: अन्य है ।
अनुवाद– परा वैराग्य के बार-बार अभ्यास करने से जब मानसिक क्रियाएँ शान्त होकर केवल संस्कार शेष रह जाते हैं तो वह ‘असम्प्रज्ञात समाधि’ है ।
व्याख्या– इस सम्प्रज्ञात समाधि के सधने पर मन वश में हो जाता है तथा चित्त की वृत्तियाँ शांत हो जाती हैं । वे अब संसार के भोगों की ओर नहीं भागतीं । वे स्वभाव से ही इनसे उपरत हो जाती हैं । इसी को विराम प्रत्यय कहा जाता है । जब इसका अभ्यासक्रम भी बंद हो जाता है तो चित्त की वृत्तियों का सर्वथा अभाव हो जाता है । केवल उस समय यह वृत्तियाँ संस्कार के रूप में चित्त में विद्यमान रहती हैं । यह १६ वें सूत्र में बताये गए परम वैराग्य से स्थित स्वभाव वाली होती है । इस प्रकार की समाधि को असम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं । जो इस स्थिति को उपलब्ध नहीं हुए तथा सम्प्रज्ञात समाधि तक ही आकर रुक गए वे इस अवस्था को शून्य की स्थिति कहते हैं किंतु जो उपलब्ध हुऎ हैं वे इसे शून्य नहीं बल्कि अधिक स्पष्ट कहते हैं । इसमें केवल आत्म सत्ता का भान होता है । इसमें मन की क्रियाएँ बंद हो जाती हैं, विचार ही बंद हो जाते हैं, अहं भी गिर जाता है तथा द्वैत भी नहीं रहता ।
इस असम्प्रज्ञात समाधि में अभ्यासक्रम समाप्त हो जाता है । केवल बीज रूप में जो चित्त के संस्कार शेष रहते हैं उसका आत्मा में अपने कारण में लीन हो जाने से उस आत्मा का प्रकृति के साथ जो संयोग था उसका सर्वथा अभाव हो जाता है एवं आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त हो जाती है ।
सूत्र– ३ में बताई गई स्थिति को जब आत्मा प्राप्त कर लेती है तो उसीको ‘निर्बीज समाधि’ कहते हैं । यही ‘कैवल्यावस्था’ है ।
असम्प्रज्ञात समाधि में चेतन-मन की सारी क्रियाएं बंद हो जाती हैं किंतु अचेतन-मन में छिपे अनेक जन्मों के संस्कार विद्यमान रहते हैं जिससे पुनर्जन्म फिर होता है किंतु वह अंतिम होगा । इसको ‘सबीज समाधि’ कहते हैं । इस बीज को मिटाने के लिए फिर प्रयत्न करना पड़ेगा। इस बीज को मिटने से फिर पुनर्जन्म की कोई संभावना नहीं रहती । सारा जीवन-मृत्यु चक्र ही समाप्त हो जाता है यही ‘निर्बीज समाधि’ है । इस प्रकार यह ‘असम्प्रज्ञात समाधि’ भी दो प्रकार की है । सबीज तथा निर्बीज ।।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार













