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कविता — बवाल हो गया

खामोश रहते थे हमेशा
लोगों की सुन सुनकर,
एक बार जो कहने लगे हम
तो जैसे बवाल हो गया ।

सारा जमाना था तैयार
हमारी ही छाती में मूंग दलने को,
जरा सा करवट क्या बदली हमने
तो जैसे बवाल हो गया ।

सारी उम्र बीत गई
लोगों के सपने पूरे करने में,
हमने जो देख लिया एक ख्वाब
तो जैसे बवाल हो गया ।

हमारे ही इन पंखों से
जाने कितनों ने भर ली उड़ाने,
एक बार जो खुद को उड़ाना चाहा
तो जैसे बवाल हो गया ।

खिलौना समझ कर हमारे दिल से
न जाने खेलते रहे कितने,
जरा सा दरवाजे क्या बंद किये दिल के
तो जैसे बवाल हो गया ।

प्रमोद सामंतराय
सरायपाली महासमुंद (छ.ग.)

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