
यह धनतेरस अद्वितीय है,
न सोना ,चाँदी लाना है,
जीवन में जो असली ‘धन’ है,
बस उसको ही पाना है।
यह धनतेरस ‘स्व’ को पूजने,
परोपकार सिखाने आई है।
पुराने गिले शिकवे सब,
आज मन से मिटाने आई है।
न धन की चाहत है,
न सोने का लालच है,
न चांदी के बर्तनों की,
अब कोई जरूरत।
ख़ुशियों का सिक्का ढालो,
प्रेम की कर लो तिजारत,
एक अनोखी रीत,
सिखाने आई है,
यह धनतेरस मन को मगाने,
रिश्ते सजाने आई है।
पहला ‘धन’ है सद्भाव हमारा,
जो सबको गले लगाता है।
दूजा ‘धन’ है ज्ञान की ज्योति,
जो अंधकार मिटाता है।
तीजा ‘धन’ है स्वास्थ्य की पूंजी,
जिससे जीवन जगमगाता है।
चौथा ‘धन’ है सच्चा संतोष,
जो हर पल शांति लाता है।
यह धनतेरस आत्मिक बल से,
जीवन चमकाने आई है।
नहीं चाहिए कुबेर खजाना,
न लक्ष्मी का शोर है,
चाहिए बस प्रेम की वर्षा,
जो होती चारों ओर है।
दीप जलाओ दया का,
यम को करो प्रणाम,
हर जीवन की रक्षा हो,
सबका हो कल्याण।
यह धनतेरस ‘स्व’ को पूजने,
परोपकार सिखाने आई है।
पुराने गिले-शिकवे सब,
आज मन से मिटाने आई है।
,
रूठे हुए साथी को हंसकर,
फिर से आज मना लो।
यही तो असली दौलत है,
बस आज इसे कमा लो।
मन की दरिद्रता भगाकर,
जीवन को सजा लो।
यह धनतेरस हर घर में,
सुख-समृद्धि बरसाने आई है।
यह धनतेरस अद्वितीय है,
न सोना चाँदी लाना है,
जीवन में जो असली ‘धन’ है,
बस उसको ही पाना है।
अद्वितीय धनतेरस बस यह,
गहरी बात बताने आई है ।
सब लोगों के जीवन धन को,
फिर चमकाने आई है।
रीना पटले (शिक्षिका)
शास. हाई स्कूल ऐरमा
सिवनी (मध्यप्रदेश)













