
फ़ेंक दी कलम — मैंने दमन कर दिया अरमानों को।
वैसे भी कलम में धार बहुत थी;
कुछ भी लिखता था, किसी पर लिखता था —
पर समझता ही नहीं था मेरे जज़्बातों को।
कई बार पीटते‑पीटते बचा हूँ, गिरते‑परते भागा हूँ।
बड़ा ही कच्चा था — इंक का, बिलकुल सच्चा था; बस सच ही लिखता था।
मेरी सुनता ही नहीं था, बस मदमस्त रहता था;
सच‑बाला शायद बुख़ार था उसे — कई बार तो बचते‑बचते बचा हूँ।
इसीलिए फ़ेंक दी उसे।
एक दिन वो तो मरवा ही देता था।
क्या‑क्या नहीं लिख दिया उसने — गुंडों पर, बदमाशों पर, चमचों पर, चटकारों पर,
नेताओं पर, हथियारों पर — किसी से डरता ही नहीं था।
इसीलिए फ़ेंक दी उसे।
एक दिन की बात है — हम भी उन्हीं के साथ थे; उन्होंने मुझसे कहा,
“क्यों इतना लिखते हो, लॉस्टम? तुम लिखते हो या तुम्हारी कलम? बंद कर दो लिखना, नहीं तो नोख तोड़ दूंगा।”
शायद नेता‑जी को कलम चुभ गई थी,
या शायद कलम ने सच लिख दिया था।
पर जो भी था — मुझे मारना थोड़े था।
इसीलिए फ़ेंक दी उसे।
आर एस लॉस्टम













