
कार्तिक कृष्ण पक्ष की तेरस,
तिथि अमूल्य सब जानें हैं।
प्रकटे जलनिधि से धन्वन्तरि,
सुधा कलस, सब मानें हैं।।
वेदों और पुराणों में,
इसका गाथायें भरी पड़ीं।
आयुर्वेद इन्हीं से जन्मा,
नष्ट होंय रुज सम मकड़ी।।
इन दिन पूजा इनकी होती,
श्री, कुबेर को ध्याते हैं।
पूजन-अर्चन-हवन करें सब,
कुछ खरीद घर लाते हैं।।
झाड़ू, नमक, बीज धनिया के,
इस दिन लो खरीद, शुभ हो।
धन-वैभव, यश-मान बढ़ेगा,
न फिर, घर में कोई अशुभ हो।।
कौड़ी, चक्र गोमती लायें,
कमलगटा, हल्दी की गाँठ।
सोना-चाँदी जो खरीद लें,
होंय सुखी, करें लक्ष्मी पाठ।।
नारायण को कभी न भूलें,
शिव, चतुरानन और गणेश।
स्वामी कार्तिक और उमा संग,
पूजे इस दिन सदा महेश।।
कुलपितरों को देकर तर्पण,
लें उनका आशीष सदा।
मातु-पिता की करें वन्दना,
जो नित, दु:ख हो यदा-कदा।।
करें आरती आरतिहर की,
विघ्न सभी नासें तेरे।
रोगहीन होगे जीवन-भर,
फिर, सभी कर्म हों पुण्य तेरे।।
दीपों का आयोजन सुखकर,
फैलाता इक नयी छटा।
नयी-नयी आकृतियाँ होतीं,
सृजित सभी दिशि ज्योति घटा।।
मानो अम्बर से धरती पर,
विविध रंग हर्षित छाये।
भगा तिमिर उज्जवल आभा लख,
भूत-प्रेत सब भय पाये।।
नकारात्मक शक्ति भगें सब,
वातावरण शान्ति का हो।
प्रेमानन्द मगन नर-नारी,
उर में कोई भ्रान्ति न हो।।
न अशान्ति, सन्देह मनों में,
न पीड़ा न व्यथा महान।
सुख ही सुख हो प्रेम-वेल पर,
हों हर्षित सब सुखी सुजान।।
तुलसी-सा पावन नित उर हो,
और सुदर्शन-सा हो मान।
हिम ऋतु-सा जीवन परिवर्तित,
हो जग सुखी, रहे कल्याण।।
चलती हुई छिपकली देखें,
इस दिन शुभ होता लो मान।
पूरण होंय कार्य सब तेरे,
धनतेरस दिन, लो पहचान।।
बड़े-बुजूर्गों का नित आदर,
करना हमें सिखाता है।
पितर, पूर्वज को जल तर्पण,
उन प्रति मान बढ़ाता है।।
देव उन्हीं पर खुश होते हैं,
जो सबको आदर देता।
लक्ष्मी उसी संग रहती हैं,
जो देकर कुछ न लेता।।
धर्म-कर्म व परोपकार में,
जो नित रत रहता है रोज।
वही पुरुष है करे नारि का,
जो सम्मान, लीजिए खोज।।
प्रेम बढ़ावे, प्रेम उलीचे,
डारे सब पर प्रेम फुहार।
होली के रंग में जो देखे,
पावन प्रेम, प्रकृति, संसार।।
गुरुओं के ढ़िंग नमन, दण्डवत,
करता हो विनम्रता तज मान।
पाता वह आशीष जगत से,
प्रकृति करे उसका सम्मान।।
जगत करे गुणगान उसी का,
धनतेरस दिन वही जहान।
जिस दिन नर तज क्रोध-वासना,
होय जितेन्द्रिय, शुद्ध, सुजान।।
धनतेरस का पर्व हमें नित,
देता है सन्देश सुनो।
अपने धर्म-कर्म न छोड़ो,
गीता ज्ञान सो उरहिं गुनो।।
नीति यही कहती भी तुमसे,
पर्व सदा आते हैं रहते।
पर्व जायें पर तुम न जाओ,
अपने की पहचान न लहते।।
मानवता है यही जगत हित,
जो ऊँचा उठ जाता है।
धन-वैभव, सुख सरिता पाता,
उसमे नित्य नहाता है।।
मानवता से उठो अगर तो,
होय दिव्यता उर तेरे।
मानवता से नीचे गिरकर,
होय पतन कोई न हेरे।।
अगर बढ़ो न मानव रहिए,
तो मानवता रखो सँभाल।
शिक्षा लो विभिन्न पर्वों से,
देती सदा हमें ये ढ़ाल।।
धनतेरस सबका घर भर दे,
खुशियों से, आनन्द रहे।
प्रेम और वैराग्य हृदयं हो,
न अभाव कोई कभी गहे।।
सबको मेरी बधाई इसकी,
सबका जीवन हो मंगलमय।
पावन, परम, पुनीत पर्व ये,
बदलो तुम होगे रवि-शशि मय।।
रचनाकार-
पं० जुगल किशोर त्रिपाठी (साहित्यकार)
बम्हौरी, मऊरानीपुर, झाँसी (उ०प्र०)













