
मृदुमध्यादिमात्रत्वात्ततोऽपि विशेषः ।
मृदुमध्याधिमात्रत्वात्= साधन की मात्रा हल्की, मध्य और उच्च होने के कारण; ततः= तीव्र संवेगवालों में; अपि= भी; विशेषः= {काल का} भेद हो जाता है ।
अनुवाद– साधन की मात्रा हल्की, मध्यम और उच्च होने के कारण तीव्र संवेग वालों में भी काल का भेद हो जाता है ।
व्याख्या– इस सूत्र में पतंजलि कहते हैं कि ,
जिनकी साधन की गति तीव्र है उनमें भी योग उपलब्धि की अवधि में अन्तर होता है
क्योंकि यह तीव्रता भी मात्रा के अनुसार हल्की, मध्यम तथा उच्च होती है ।
कुछ लोग उत्सुकतावश योग साधन आरम्भ कर देते हैं उनकी रुचि नहीं होती । यह अकस्मात् ही पढ़ सुन या किसी से प्रभावित होकर आरम्भ कर देते हैं किंतु दृढ़ संकल्प एवं श्रद्धा के अभाव में शीघ्र ही छोड़ भी देते हैं। ऐसे लोगों को सिद्धि नहीं मिलती बल्कि किया गया साधन भी व्यर्थ जाता है ।
दूसरे प्रकार के व्यक्ति ऐसे होते हैं जो केवल जानने के इच्छुक होते हैं वह जिज्ञासु मात्र होते हैं यह जानकर दार्शनिक बन सकते हैं ।
किंतु योग में जानना नहीं है बल्कि स्वयं करके देखना है स्वयं के अनुभव में लेना है ।
कुछ लोग नकारात्मक होते हैं वह हर समय त्याग की बातें ही कहा करते रहते हैं यह दुनिया के दु:खों को ही गिनाते रहते हैं । कि दुनिया में दु:ख ही दु:ख है । उन्हें सुख कहीं दिखाई नहीं देता ।
किंतु कांटे गिनने से
फूल नहीं खिलते,
अहिंसा से {किसी को नही मारने से} प्रेम नहीं होता ।
क्रोध छोड़ने से
दया नहीं आती ।
झोपड़ा छोड़ने से महल नहीं मिल जाता ।
विधायक {पॉजिटिव} हो जाने से निषेध अपने आप हो जाता है, करना नहीं पड़ता ।
योग में उपलब्धि की ओर ही ध्यान दिया जाता है । वह चित्त की वृत्तियों के निरोध की बात ही कहता है ।
इससे व्यक्ति खाली होता है यह ‘मृदु’ श्रेणी है । ऐसा व्यक्ति दूसरों को अपनी ओर आकर्षित कर सकता है दूसरों को श्राप दे सकता है आशीर्वाद भी दे सकता है, किंतु श्राप या आशीर्वाद देने उसकी शक्ति नष्ट हो जाती है ।
दूसरे श्रेणी ‘मध्य’ है । इसमें पहुंचकर व्यक्ति शान्त हो जाता है । मानसिक उपद्रव बन्द हो जाते हैं ।
तीसरी श्रेणी उच्च है इसमें वह सिद्धि को प्राप्त कर लेता है ।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन व प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार













