
क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेषः ईश्वर: ।
क्लेशकर्मविपाकाशयै:= क्लेश, कर्म, विपाक और आशय– इन चारों से; अपरामृष्टः= जो सम्बन्धित नहीं है; {तथा} पुरुषविशेष:= जो समस्त पुरुषों से उत्तम है, वह; ईश्वर:= ईश्वर है ।
अनुवाद– जो- क्लेश, कर्म, कर्मों के फल और कर्मों के संस्कारों के सम्बन्ध से रहित है तथा समस्त पुरुषों से उत्तम {पुरुषोत्तम} है वह ईश्वर है ।
व्याख्या– इस सूत्र में पतंजलि ईश्वर की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि वह ईश्वर पांचो प्रकार के क्लेशों {अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, और अभिनिवेश} चारों प्रकार के कर्म {पुण्य, पाप, पुण्य और पाप, मिश्रित तथा पुण्य पाप से रहित} कर्म विपाक {कर्मों के फल} तथा कर्मों की आशय {कर्मों की संस्कार} के सम्बन्धों से रहित है
जबकि जीव का इससे अनादि सम्बन्ध है । यह विकारों से युक्त को ही जीव कहा जाता है किंतु ईश्वर का इसे कोई सम्बन्ध नहीं है ।
यह सब विकार प्रकृति जन्य तथा अविद्यादि कारणों से हैं जिनका नाश होने पर आत्मा अपने स्वरूप को उपलब्ध हो जाती है ।
ईश्वर के सभी गुण आत्मा के भी गुण हैं दोनों एक ही हैं । ईश्वर ‘समष्टि’ चेतन तथा आत्मा ‘व्यष्टि’ चेतन है । वह सभी पुरुषों में उत्तम है इसलिए उसे ‘पुरुषोत्तम’ अथवा ‘पुरुष विशेष’ कहा जाता है ।
जीवन में ईश्वर के गुण नहीं आ सकते तथा ईश्वर में जीव के गुण नहीं होते ।
यही भिन्नता है ।
जीव स्वयं मिट जाता है तो जो शेष बचता है वह ईश्वर ही है क्योंकि जीव में वह ईश्वर आत्मा स्वरूप में विद्यमान है ।
मुक्त पुरुष का भी इन प्रवृत्ति जन्य विकारों से पूर्व सम्बन्ध रहा था किंतु ईश्वर का तो इसे कभी संबंध नहीं रहा इसलिए उसे ‘पुरुष विशेष’ कहा गया है ।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार













