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राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त

झाँसी चिरगाँव की माटी,
धन्य हुई धरा,जहाँ ये जनमे,
मैथिलीशरण नाम है पाया,
राष्ट्रकवि बनकर चमके।

तीन अगस्त अठारह सौ छियासी,
सेठ रामचरण,माता काशी,
देख पुत्र की कंचन काया,
चौड़ी हो गई उनकी छाती।

स्कूल गए पर मन न लगाया,
घर पर ही अपना ज्ञान बढ़ाया,
संस्कृत, हिंदी, बांग्ला का,
गहन अध्ययन उनमें समाया।

मुंशी अजमेरी से सीखा,
काव्य पथ पर कदम बढ़ाया,
ब्रजभाषा में ‘कनकलता’,
छोटी उम्र में ही रचाया।

द्विवेदी जी का सान्निध्य मिला,
खड़ी बोली को अपनाया,
‘सरस्वती’ में रचना छपी,
सबने उनका लोहा मानाया।

‘रंग में भंग’,और’जयद्रथ वध’,
उनकी लेखनी का था बल,
‘भारत-भारती’ तुमने लिखकर,
देश प्रेम का स्वर मुखरित कर।

​राष्ट्रीयता का गान किया,
गांधीवाद का मान किया,
भारत अतीत का गौरव दिखाया,
नारी को विशेष स्थान दिया।

गाँधी जी ने कहा राष्ट्रकवि,
मिला उन्हें ये सम्मान,
राज्यसभा के सदस्य बने,
बढ़ाया हिंदी का सम्मान।

राष्ट्रकवि तुम धन्य,
और धन्य तुम्हारी वाणी,
“साकेत” रचा तुमने,
और “यशोधरा” का गान किया।

खड़ी बोली को दिया सम्मान,
तुम युग के सर्जक हो,
तुम्हारी कीर्ति अमर है,
तुम साहित्य के रक्षक हो।

12 दिसंबर सन् 64 में,
दिया लेखनी को विराम,
सूर्य अस्त हुआ झांसी का,
अमर हो गया मैथिली नाम।

झाँसी चिरगाँव की माटी,
धन्य हुई धरा,जहाँ ये जनमे,
मैथिलीशरण नाम है पाया,
राष्ट्रकवि बनकर चमके।

        रीना पटले (शिक्षिका)
   शास हाई स्कूल ऐरमा (कुरई) 
    जिला - सिवनी (मध्यप्रदेश)

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