
।। मौसम परिवर्तन के समय इन व्रत का स्वास्थ्य पर विशेष महत्व कृपया यह लेख बार-बार पढ़ें ।।
!! ऋषियों द्वारा दिए गए प्राचीन स्वास्थ्य सूत्र !!
१. अजीर्णे भोजनं विषम् ।
यदि पहले लिया हुआ भोजन का पाचन न हुआ हो और दूसरा भोजन लिया जाए तो वह विष (जहर) के समान हो जाता है, इसलिए भूख लगने पर ही भोजन करें ।।
२. अर्धरोगहरी निद्रा ।
अच्छी निद्रा से आधी से अधिक बीमारियां स्वयं दूर हो जाती हैं ।।
३. मुद्गदाली गदव्याली ।।
सभी दालों में से हरे मूंग सबसे अच्छे होते हैं। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। अन्य सभी दालों के एक या अन्य दुष्प्रभाव होते हैं ।।
४. भग्नास्थि-संधानकरो लशुनः ।।
लहसुन टूटी हुई हड्डियों को भी जोड़ देता है ।।
५. अति सर्वत्र वर्जयेत् ।।
किसी भी चीज का अत्यधिक सेवन, सिर्फ इसलिए कि उसका स्वाद अच्छा है, स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं होता । इसलिए संयमित रहें ।।
६. नास्ति मूलमनौषधम् ।।
ऐसी कोई तरकारी {सब्जी} नहीं है, जिसका शरीर को कोई औषधीय लाभ न हो ।।
७. न वैद्यः प्रभुरायुषः ।।
कोई वैद्य {डॉक्टर}, अलग से दीर्घायु देने में सक्षम नहीं है ।।
८. चिंता व्याधि प्रकाशाय ।।
चिंता से स्वास्थ्य बिगड़ता है, इसलिए अनावश्यक चिंता ना करें ।।
९. व्यायामश्च शनैः शनैः ।।
कोई भी एक्सरसाइज, व्यायाम धीरे-धीरे करें।
{तेज गति से व्यायाम करना अच्छा नहीं है}
१०. अजवत् चर्वणं कुर्यात् ।
अपने भोजन को खूब चबाएं ।
कभी भी बहुत ही शीघ्रता से भोजन न करने से मुख में लार नहीं बनता,
{लार भोजन के पाचन में सहायता करती है}
११. स्नानं नाम मनःप्रसाधनकरं दुःस्वप्न-विध्वंसनम् ।
नहाने से डिप्रेशन {अवसाद} और कष्ट दूर होता है ।।
बुरे सपनों को दूर भगाता है ।।
१२. न स्नानमाचरेद् भुक्त्वा ।।
भोजन करने के तुरंत बाद, कभी भी नहीं नहाना चाहिए।
{पाचन प्रभावित होता है}
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१३. नास्ति मेघसमं तोयम् ।।
बारिश के पानी की शुद्धता से अधिक कोई भी पानी शुद्ध नही होता ।।
१४. अजीर्णे भेषजं वारि ।
अपच होने पर सादा पानी औषधि का काम करता है ।।
१५. सर्वत्र नूतनं शस्तं, सेवकान्ने पुरातने ।
सदैव ताजी {सत्वर} चीजों को प्राथमिकता दें..
जबकि चावल और नौकर पुराने होने पर ही अच्छे होते हैं ।।
१६. नित्यं सर्वा रसा भक्ष्याः ।।
ऐसा भोजन करें जिसमें सभी छह प्रकार के स्वाद हों।
जैसे– {नमकीन, मीठा, कड़वा, खट्टा, कसैला और तीखा}
१७. जठरं पूरायेदर्धम् अन्नैर्, भागं जलेन च ।
वायोः संचरणार्थाय चतर्थमवशेषयेत् ।।
अपना आधा पेट भोजन से भरें,
एक चौथाई पेट पानी से और बाकी पेट के भाग को, खाली छोड़ दें ।।
१८. भुक्त्वा शतपथं गच्छेद् यदिच्छेत् चिरजीवितम् ।
यदि दीर्घ {लम्बा} जीवन जीना चाहते हैं तो, भोजन के बाद सौ कदम चलें
और फिर बाईं ओर करवट लेकर थोड़ी देर लेट जाएं ।।
१९. क्षुत्साधुतां जनयति ।।
भूख, भोजन का, स्वाद बढ़ा देती है ।।
इसलिए हम, भूख लगने पर ही भोजन करें ।।
२०. चिंता जरा नाम मनुष्याणाम् ।।
चिंता करने से जल्दी आ जाता है बुढ़ापा…
२१. शतं विहाय भोक्तव्यं, सहस्रं स्नानमाचरेत् ।।
सौ काम छोड़ कर भोजन कर लेना चाहिए ।
और एक हजार काम छोड़कर स्नान कर लेना चाहिए ।।
२२. सर्वधर्मेषु मध्यमाम् ।।
हमेशा बीच का रास्ता चुनें ।।
किसी भी चीज की अति करने से बचें ।।
!! भक्ष्य अभक्ष्य {अर्थात्, कौन वस्तु खाने लायक है कौन नहीं खाने लायक है} का- सदा ध्यान रखना चाहिए !!
हरिकृपा ।।
संकलन में प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार













