
पूर्वेषामपि गुरु: कालेनानवच्छेदात् ।
{वह ईश्वर सबके} पूर्वेषाम्= पूर्वजों का; अपि= भी; गुरु:= गुरु है; कालेन अनवच्छेदात्= क्योंकि उसका काल से अवच्छेद नहीं है ।
अनुवाद– वह ईश्वर पूर्वजों का भी गुरु है क्योंकि उसका काल से अवच्छेद नहीं है {अनादि है} ।
व्याख्या– ईश्वर सर्वज्ञ है, वही ज्ञान का भंडार है । सभी ज्ञान उसी से आया है । उसका काल से अवच्छेद नहीं है क्योंकि वह अनादि है । सबका गुरु ब्रह्मा को माना जाता है किंतु सर्ग के आरम्भ में उत्पन्न होने के कारण उसका भी काल से अवच्छेद है इसलिए वह ईश्वर ब्रह्मा का भी गुरु है ।
इस सूत्र में कहा गया है कि वह ईश्वर पूर्वजों का भी गुरु है । असली गुरु तो ईश्वर ही है । अन्य जागतिक गुरु भी उसी की प्रेरणा से उपदेश देते हैं इसलिए इन गुरुओं को भी ब्रह्मा विष्णु और महेश कहा जाता है । आत्मज्ञान के बाद ही कोई गुरु होने का अधिकारी होता है क्योंकि तभी उसमें ईश्वरीय ज्ञान का अनुभव होता है ।
ऐसा गुरु ईश्वर ही है ।
गुरु शब्द भारतीय आध्यात्म का है ।।
अंग्रेजी में इसकी अभिव्यक्ति के लिए कोई शब्द नहीं है ।
अंग्रेजी में इस टीचर ही कहा जाता है किंतु टीचर {शिक्षक} केवल सूचना मात्र देता है जो उसने बाहर से एकत्र की है जबकि गुरु भीतर से प्राप्त अनुभव देता है वह आत्मज्ञान कराता है । मुक्त कराता है । शिक्षक के पास छात्र होते हैं गुरु के पास शिष्य होते हैं दोनों में बड़ा अन्तर है । जिसे आत्मज्ञान हो चुका है उसने जिसने उस परम तत्व की अनुभूति कर ली है वही गुरु हो सकता है तथा वही अपने ज्ञान को आगे पहुंचाने के लिए शिष्य बना सकता है । अन्य को अधिकार नहीं है । ऐसा गुरु ज्ञान नहीं देगा बल्कि शिष्य का पूर्ण रूपान्तरण करेगा, उसको द्विज {द्विजन्मा} बनाता है, उससे शिष्य को नया जन्म मिलेगा । ये गुरु जब निर्वाण को प्राप्त हो जाते हैं । तो इन शरीरधारी गुरुओं के भी गुरु हो जाते हैं । शरीरधारी गुरु इन्हीं से संपर्क कर ज्ञान प्राप्त करते हैं । कोई भी साधक पहले इन जागतिक गुरुओं से ज्ञान लेता है फिर वह उच्च भूमि में पहुंच जाता है तो यह गुरु अपनी मृत्यु के बाद भी उन्हें ज्ञान उपदेश था प्रेरणा देते रहते हैं ।
‘थियोस्फफी’ में इन्हें मास्टर्स कहते हैं जो साधक निष्ठा पूर्वक किसी मार्ग पर चलता रहता है उन्हें इन अदृश्य गुरुओं का सहयोग अवश्य प्राप्त होता है । पतंजलि ऐसी मास्टर्स {गुरुओं} को पूर्वज कहते हैं जो पहले थे किंतु आज संसार में नहीं है । ईश्वर इनका भी गुरु है ।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार













