
विधा : विषाद
रचनाकार : कौशल
अँधेरी रात में मन रोता रहता
यादों का बोझ दिल तोड़ता रहता
सन्नाटा चीर के पीड़ा गूँज उठे
अश्कों का सागर फिर से भर उठे
सपनों की नाव भी डूबा करती
उम्मीदों की लौ बुझ जाया करती
तन्हाई का ज़हर मन पीता जाता
हर लम्हा खुद को बस खोता जाता
बीते पल दिल में खंजर बन जाते
नींदें आँखों से पल में खो जाते
चाहत का फूल भी मुरझा-सा जाए
दिल का मौसम बस सूना हो जाए
राहों में धूमिल सपनों की धड़कन
यादों की पोटली भारी हर क्षण
चाँद उदासी का आँचल फैलाए
तारे भी रोकर खुद को छिप जाए
टूटे अरमानों का बोझ न सह पाए
होठों की खामोशी चीखें दब जाए
दिल की दीवारों पर वीरान लिखा
किस्मत ने कितना ना-इंसाफ़ किया
हर उम्मीदों में जंग लगी दिखती
खुशियों की राहें बस बंद-सी मिलती
रोते-रोते ये दृश्य धुँधला जाए
रात भी ग़म की चादर ओढ़े जाए
सूना जीवन है, मंज़िल का क्या नाम
अँधियारा बनकर बस छाया है ग़मजाम
टूटे सपनों का बोझ बढ़ा जाता
जीवन का साया भी छूटता जाता













