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महिमा अगम अपार है छठी मैया

 " मैया की महिमा अपार
   हे छठी माता
   मैया के घाट पर व्रती बहुत हैं
   हाथ जोड़ पनियां में खाड़"

इन्हीं पारंपरिक गीतों से वातावरण गुंजायमान हो उठता है। भारत देश त्योहारों का देश है। जहां सनातन धर्म का अपना ही महत्व है। हमारा देश सूर्योपासना के लिए प्रसिद्ध पर्व है, छठ मूलतः सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा जाता है। सामान्यत: यह त्यौहार बिहार, झारखंड, और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है।यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत्र और दूसरी बार कार्तिक मास में मनाया जाता है। चैत्र शुक्ल पक्ष में सस्ती पर मनाए जाने वाले छठ पर्व को चैती छठ और कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाला पर्व कार्तिकी छठ कहा जाता है। छठ पूजा में सूर्य देवता की उपासना कर उनका अभिवादन किया जाता है। लोक परंपरा के अनुसार सूर्य देव और छठी मैया का संबंध भाई-बहन का है।ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत सूर्य हैं, जिसका हमारे जीवन में विशेष महत्व है। पारिवारिक सुख -समृद्धि तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है। स्त्री और पुरुष समान रूप से इस पर्व को मानते हैं। हमारे देश में कृतज्ञ होना सिखाया जाता है जिसमें हम हर उसे चीज के प्रति कृतज्ञ हैं जिसने हमारे जीवन में अपना योगदान दिया इस तरह छठ पूजा के जरिए हम सूर्य देवता को धन्यवाद देते हैं। यही एक कारण है कि हम भारतवासी भावुक होते हैं, हमें हमारे धर्म से ही कोमलता मिलता है और यही भाव हमें दिल से एक दूसरे का बनता है और यही भाव जीवन से जुड़ी हर संजीव और निर्जीव वस्तु का महत्व बताता है।
छठ व्रत के संबंध में अनेक कथाएं प्रचलित है, उनमें से एक कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राज पाठ जुए में हार गए, तब श्री कृष्ण के द्वारा बताए जाने पर द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। तब उनकी मनोकामनाएं पूर्ण हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिला।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, छठ मैया को ब्रह्मा जी का मानस पुत्री कहा जाता है और ऐसा कहा जाता है कि ये वही देवी हैं जिनकी पूजा नवरात्रि में षष्ठी तिथि को की जाती है। इनकी पूजा करने से संतान को लंबी उम्र प्राप्त होती है व संतान प्राप्ति भी होती है।
पौराणिक कथा के अनुसार छठ पर्व का आरंभ महाभारत काल के समय में माना जाता है। कर्ण का जन्म
सूर्य नारायण के द्वारा दिए गए वरदान के कारण कुंती के गर्भ से हुआ था। इसलिए ये सूर्यपुत्र कहलाते हैं और सूर्य नारायण की कृपा से इनको कवच और कुंडल प्राप्त हुए थे। सूर्य देव के तेज और कृपा से ही ये तेजवान वी महान योद्धा बने। ऐसा कहा जाता है कि इस पर्व की शुरुआत सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण के द्वारा सूर्य की पूजा करके की थी। कारण प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े रहकर सूर्य पूजा करते थे और उनका अर्थ देते थे। इसलिए आज भी छठ पूजा में सूर्य को अर्थ देने की परंपरा चली आ रही है।
पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, रामायण काल में भगवान श्री राम के अयोध्या वापस आने के बाद सीता माता जी के साथ मिलकर कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्य उपासना करने से भी इस त्यौहार को जोड़ा गया है। व्रती इस पारंपरिक गीतों को गाती हैं।
” ऐ कोपी -कोपी बोली छठी माता
सुनीं ऐ सेवक लोग
मोरा घाटे दूबिया जन्मी ग‌ईले
मकड़ी बसेर लेले”
“कांच ही बांस के बहंगिया बहंगी लचकत जाए
हैं ना कंहरिया कवन बाबू द‌उरा घाटे पहुंचाए
ई बहंगी सूरज बाबा के जाए
ई बहंगी छठी मैया के जाए”
व्रती बड़े ही जोश और आस्था से इस गीत को गाते हैं और मंगल की कामना करते हैं।
छठ पर्व को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो षष्ठी तिथि को एक विशेष खगोलीय परिवर्तन की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती है, किस कारण इसके संभावित कुप्रभावों से मानव की यथासंभव रक्षा करने का सामर्थ्य प्राप्त होता है।
“गेहूं का ठेकुआ, चावल के लड्डू, खीर अनानास, नींबू और कद्दू
छठी मैया करें हर मुराद पूरी बांटे घर-घर लड्डू”
जय हो छठी मैया की करें मनोकामना हमारी पूरी”
सूर्य को पृथ्वी पर जीवन का आधार माना जाता है। सूर्य को जल देने से सेहत संबंधी फायदे भी प्राप्त होते हैं। जीवन में जल और सूर्य की महत्ता को देखते हुए छठ पर्व पर सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। भगवान सूर्य नारायण की कृपा से व्यक्ति को तेज व मान सम्मान की प्राप्ति होती है।
जाति और धर्म का बंधन भी टूट जाता है ऐसा लगता है मानों हर कोई
इससे जुड़ गया हो। छठ पूजा जहां एक और लोक आस्था को मजबूती प्रदान करता है वहीं हमारे सांस्कृतिक मूल्यों एवं संस्कारों को पीढ़ी- दर -पीढ़ी बढ़ाने की कवायद करता है तो वही यह सामाजिक एकजुटता तथा सोहार्द का भी संदेश देता है।
छठ पूजा चार दिन तक बहुत धूमधाम से मानने वाला त्यौहार है।
इसको डाला छठ, छठी मैया, छठ माई पूजा, सूर्य षष्ठी -पूजा आदि नाम से जाना जाता है।
शहरों में गंगा नदी में या छत पर
अर्ध्य दिया जाता है वहीं गांव में महिलाएं छोटे-छोटे तालाबों पोखरा के किनारे ही इस त्यौहार को धूमधाम से मनाती हैं। मधुर गीत से छठी मैया की
स्तुति करती हैं।
भगवान सूर्यदेव से गुहार लगाती हैं
“सूपवे नरियरवे बोझिल मोरी नैया
के न‌इया पार लग‌इहें
मैं बनजारिन राम के
सीता जोहली बाट”
यह चार दिन तक चलने वाला त्यौहार है। यह त्यौहार कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से प्रारंभ होकर सप्तमी तिथि तक होता है।
प्रथम दिन- नहाय खाय, सबसे पहले दिन इस व्रत में नहाना और घर की साफ -सफाई प्रमुख होती है। इसके अलावा इस व्रत में शुद्ध शाकाहारी भोजन ही किया जाता है।
द्वितीय दिन- खरना , इसके दूसरे दिन खरना की विधि होती है। खरना में व्रती को पूरे दिन का उपवास रखकर शाम के समय गन्ने का रस या गुड़ में बने हुए
व्यंजन से चावल की खीर प्रसाद के रूप में खाना होता है। इस दिन गुड़ की बनी खीर बहुत ही स्वादिष्ट होती है।
तृतीय दिन- इसके तीसरे दिन उपवास रखकर शाम के समय डूबते हुए सूर्य देव को पानी चढ़ाया जाता है और जो भी पूजा की सामग्री है उनका दौरा में रखकर घाट पर लेकर जाते हैं। शाम को सूरज देव को अर्ध्य देकर घाट से लौट जाते हैं। इस दिन रात के समय में छठी माता के गीत गाए जाते हैं और कथा भी सभी लोग सुनते हैं।
“जोड़े -जोड़े फलवा सूरज देव घटवा पे तिव‌इत चढ़ावे हो
जल बीच खड़ा होके दर्शन ला आसरा लगावे हो
जोड़े जोड़े सूपवा सूरज देव के घटवा पे तिव‌ईत चढ़ावे हो
जल बीच खड़ा होके अर्जिया लगावे हो”
चतुर्थ दिन- सुबह का अर्ध्य, फिर अगले दिन सुबह जल्दी ही सूर्य की निकलने वाली पहली किरण को अर्ध्य दिया जाता है ।
“निंदिया के मातल सूरज पलकों ना खोले हे उगी ना सूरजदेव लीहीं ना अरगिया हे
कर जोड़े खाड़ बाड़े सभ व्रतीयां हे”
इसी गीत से भगवान सूर्यदेव और छठी माता को जगाया जाता है । अर्ध्य लेने के लिए आमंत्रित किया जाता है।
उसके बाद जो छठ माता है उनको प्रणाम कर उनसे संतान की रक्षा का भी वर मांगते हैं। अर्ध्य देने के बाद सभी लोगों को प्रसाद वितरण किया जाता है। छठ पूजा की समाप्ति हो जाती है।
ऐसी मान्यता है कि छठ पूजा का त्यौहार करने से व्यक्ति सभी प्रकार के दुःख दर्द एवं बीमारियों से दूर रहता है।
इसी के साथ-साथ उसे व्यक्ति के परिवार के लोग भी सुरक्षित रहते हैं। अतः इस त्यौहार को करने की प्रमुख मान्यता यह है कि उसके बच्चों पर कोई भी संकट नहीं आता है और माता छठ भगवान सूर्य देव की कृपा उसे व्यक्ति के परिवार पर सदैव बनी रहती है। इस महाव्रत के दौरान हर तरफ लोग भक्ति में सराबोर और हो जाते हैं।
और हर ओर बस आपसी प्रेम, अपनापन, सोहार्द पूर्ण वातावरण छा जाता है।
छठ पूजा प्रतिवर्ष दीपावली के छठवें दिन शुरू होती है। भारत के अनेकों राज्य से लोग छठ पूजा का आनंद उठाने के लिए उत्तर प्रदेश एवं बिहार आते हैं।

डॉ मीना कुमारी परिहार ‘मान्या’

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