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दो राहें

एक राह थी — जिसको मंज़िल नहीं,
दूजी राह — जिस पर तू नहीं।
मैं वीरान जंगल में खड़ा हूँ,
सोचता हूँ अब कहाँ जाऊँ —
वो जहाँ तू नहीं,
या वो जहाँ मंज़िल नहीं।

तू मेरी ज़रूरत है,
और मंज़िल मेरी चाहत।
दोनों ने मुझे बाँध लिया है,
इधर मोहब्बत, उधर किस्मत।

दोनों मजबूर करती हैं,
ज़िंदगी से दूर करती हैं।
जीने को तो ज़िंदा हूँ मैं,
पर तेरी यादें — जीने कहाँ देती हैं।

मैं राह में ही खड़ा हूँ अभी,
तेरी तस्वीर हाथों में लिए।
आँखों में सपने सँजोए हुए,
अरमानों का हुजूम सजाए हुए।
हर कदम तेरा नाम पुकारता है,
हर साँस तेरा एहसास जगाए हुए।

साँसों पर अब बस नहीं रहा मेरा,
धड़कनों पर कोई अंकुश नहीं रहा मेरा।
कदम तेरी ओर खिंचे चले आते हैं,
अब दिल पर लगाम नहीं रहा मेरा।

हर लम्हा तेरा ही गुण गाता है,
तेरा नाम ले मुझे चिढ़ाता है।
नींद आँखों से कहीं खो गई,
अब शब्द भी अपने नहीं रहे मेरा

आर एस लॉस्टम

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