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वो बालक नरेन्द्र

वडनगर की मिट्टी में गूँजी एक पुकार,
गरीबी के आँगन में जन्मा था सितार।
दामोदरदास के आँगन का वो लाल,
माँ हीराबेन की ममता में पला निहाल।

रेल की पटरियों पर बजती थी रुनझुन,
पिता संग चाय बेचता नन्हा सा मन।
कपों में घुलती थी मेहनत की मिठास,
संघर्ष से सींचा उसने अपना विश्वास।

स्कूल के गलियारे में चमकता था नाम,
वाद-विवाद में दिखता नेतृत्व का धाम।
भारत माता के प्रति समर्पित था हृदय,
सैनिकों का आदर, साधुओं का अध्ययन नित्यदय।

किशोर मन जुड़ गया संघ के रंग में,
सेवा-साधना रच गई जीवन के संग में।
संयम को साथी, तपस्या को राह बनाई,
“देश पहले, स्वयं बाद में” प्रतिज्ञा निभाई।

न झुका गरीबी से, न टूटा हालातों से,
बनाया जीवन मंदिर कर्म के साथों से।
जहाँ सीमाएँ रुकती हैं, वहाँ वो चलता गया,
हर कठिनाई को अवसर बनाता गया।

आज वही बालक देश का प्रकाश बना,
विश्व-पटल पर भारत का विश्वास बना।
संघर्ष से शिखर तक उसकी यह कहानी,
सिखाती है — “मन में हो विश्वास, तो किस्मत भी हो पानी।”

आर एस लॉस्टम

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