
दिल्ली में एक जाने-माने चिकित्सक डॉ. अरोरा रहते थे। ईमानदारी ही उनकी पहचान थी। उनके घर में पत्नी, बेटा नमन और बेटी नित्या थे। दोनों बच्चे संस्कारी और शिक्षित थे। पर अब घर में एक ही चिंता थी कि नित्या तीस वर्ष की हो चुकी थी और अब तक उसका विवाह नहीं हो पाया था। इस कारण घर का माहौल अक्सर बोझिल रहता था।
नित्या एक निजी बैंक में कार्यरत थी। वह आत्मनिर्भर, सौम्य और आत्मसम्मान से भरी हुई लड़की थी। उसने अपने जीवन को अपने परिश्रम से सँवारा था। परंतु जब भी उसके माता-पिता उसके विवाह की बात करते, तो हर बातचीत का केंद्र “गुण” नहीं बल्कि “गणना” बन जाता था।
लड़के वाले पूछते —
“लड़की की सैलरी कितनी है?”
“आपका घर खुद का है या किराए का?”
“गाड़ी कौन सी कंपनी की है?”
“शादी के बाद नौकरी छोड़ेगी या नहीं?”
हर बार यही प्रश्न नित्या के दिल में चुभ जाते। उसे लगता जैसे वह कोई इंसान नहीं, बल्कि एक “पैकेज” है , जिसे देखा, परखा और फिर तुलना कर खरीदा जा रहा है। विवाह, जो कभी दो आत्माओं का पवित्र बंधन माना जाता था, अब उसे व्यापार जैसा प्रतीत होता था।
एक दिन एक नया रिश्ता अभिषेक शर्मा नामक युवक का आया , जो अमेरिका में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। परिवार प्रतिष्ठित था। नित्या के माता-पिता को लगा शायद यही वह रिश्ता है जिसकी प्रतीक्षा वे बरसों से कर रहे थे। बातचीत तय हुई।
अभिषेक के पिता ने मधुर स्वर में कहा —
“हम दहेज तो नहीं लेते, पर शादी अमेरिका में करनी होगी, खर्च आपका रहेगा और हाँ, लड़की की सैलरी भी अच्छी है, दोनों मिलकर परिवार संभालेंगे तो जीवन सुगम रहेगा।”
फिर मुस्कराते हुए बोले —
“आजकल सब पार्टनरशिप मॉडल पर चलता है, लेन-देन नहीं कहिए, इन्वेस्टमेंट समझिए।”
डॉ. अरोरा कुछ क्षण के लिए मौन हो गए। उनके होंठ काँपते हुए बोले —
“मगर यह तो दहेज ही हुआ न?”
लड़के के पिता सहजता से बोले —
“नहीं-नहीं, ऐसा कुछ नहीं… बस थोड़ी-सी समझदारी है।”
नित्या यह सब सुन रही थी। उसका दिल टूट गया। वह सोचने लगी कि विवाह, जिसे वह श्रद्धा, विश्वास और प्रेम का प्रतीक मानती थी, अब एक सौदे की तरह लगने लगा था। जहाँ पहले दिल जुड़ते थे, वहाँ अब बैंक-बैलेंस और पैसों का हिसाब जोड़ा जा रहा था।
अभिषेक और उसके माता-पिता चले गए। उस रात नित्या देर तक जागती रही। उसने अपनी डायरी के पन्नों पर लिखा —
“माँ-पापा, मैं विवाह करना चाहती हूँ, पर सौदे पर नहीं। मैं रिश्ता नहीं, रिश्ता निभाने वाला वर चाहती हूँ। अगर विवाह का अर्थ आज केवल लेन-देन है, तो मैं अकेले ही रहना पसंद करूँगी , पर बिकूँगी नहीं।”
सुबह होते ही उसने वह डायरी अपने माता-पिता को थमा दी। डॉ. अरोरा ने बेटी की बात पढ़ी और उनकी आँखें भर आईं। उन्होंने उसी दिन वह रिश्ता मना कर दिया।
मोहल्ले में कानाफूसियाँ शुरू हो गईं —
“लड़की में घमंड है।”
“इतना अच्छा रिश्ता ठुकरा दिया!”
“आजकल की लड़कियाँ बहुत सोचने लगी हैं।”
पर नित्या शांत रही। वह जानती थी कि सच्चाई पर टिके रहना आसान नहीं होता। उसने समाज की परवाह से पहले अपने आत्म-सम्मान की रक्षा करना चुना।
समय बीतता गया। नित्या ने अपनी नौकरी जारी रखी और बाद में एक संस्था की स्थापना की — “विवाह एक संस्कार, न कि सौदा।”
वह युवाओं को समझाने लगी कि विवाह कोई लेन-देन नहीं, बल्कि जीवन का संगम है। वह कहती थी कि “जब तक विवाह ‘कितना दिया-कितना पाया’ पर टिका रहेगा, तब तक वह बंधन नहीं बन सकता। विवाह तब ही सफल है, जब दोनों पक्ष ‘कितना निभाया-कितना समझा’ सोचें।”
आज भी जब कोई उससे पूछता है— “नित्या, तुमने अब तक शादी क्यों नहीं की?”
वह मुस्कुराकर कहती —
“क्योंकि मैं विवाह चाहती हूँ, सौदेबाजी नहीं।”
धीरे-धीरे नित्या की सोच समाज में परिवर्तन का कारण बनने लगी। अब उसके गाँव और आसपास के क्षेत्रों में कोई भी परिवार विवाह के लिए दहेज की सौदेबाजी नहीं करता। उसकी संस्था “विवाह एक संस्कार, न कि सौदेबाजी” आज बहुत प्रसिद्ध हो चुकी है।
नित्या ने यह साबित कर दिया कि जब विवाह संस्कार से हटकर सौदे में बदल जाए, तो सबसे पहले आत्मा घायल होती है और जो अपने आत्म-सम्मान को बचा ले, वही सच्चा विजेता कहलाता है।
योगेश गहतोड़ी “यश”
(ज्योतिषाचार्य)
नई दिल्ली – 110059













