
वह लड़की
जो रहती तुम्हारे अंदर
सर झुकाए,दबी दबी सी,
बंधी, कैद, समाज के
रीति-रिवाज में,
आने दो उसे बाहर,
उम्र को धता बता कर—–
बीता अरसा
निभाती जिम्मेदारी,
झुके कंधों को
सीधा करने की अब बारी।
उस लड़की को मुस्कुराने दो—-
आंखों में
खुशियों को झिलमिलाने दो,
नयी चलती हवाओं को
बाहें फैलाए
महसूस करने दो,
उसे खुश होने दो——
नई संभावनाओं के द्वार,
उसे खटखटाने दो,
उसे बाहर आने दो—-
सुलेखा चटर्जी– भोपा













