
गंगा तट के समीप बसा देवग्राम धर्म, परंपरा और शिक्षा के नाम से प्रसिद्ध था। वहीं आदित्य और ईशा नाम के शिक्षित, संस्कारी और एक-दूसरे के प्रति आदरपूर्ण दंपति निवास करते थे। इनके साथ इनकी माता जी श्रीमती सुमित्रा जी और पिता श्री सत्यम जी भी रहते थे। इनके विवाह को दो वर्ष बीत चुके थे। अब ईशा गर्भवती भी हो गई थी। जब ईशा के गर्भवती होने का समाचार परिवार तक पहुँचा, तो पूरे परिवार में आनंद की लहर दौड़ गयी। हर ओर उल्लास, श्रद्धा और नए जीवन के आगमन की प्रतीक्षा थी।
आदित्य की माता सुमित्रा देवी वेदों की ज्ञाता थीं। उन्होंने पुत्र और बहू को समझाया —
“यह केवल नया जीवन नहीं, बल्कि संस्कारों का बीजारोपण है। अब समय है पुंसवन संस्कार का जो गर्भस्थ शिशु के भीतर सत्त्व, तेज और विवेक को जाग्रत करता है।”
ईशा के मन में जिज्ञासा जागी और उसने पूछा — “माँ, क्या यह संस्कार पुत्र की कामना के लिए होता है?”
सुमित्रा मुस्कराईं — “नहीं बेटी, ‘पुंस्’ का अर्थ पुरुषार्थ या आत्मबल से है, न कि केवल पुत्र से। यह संस्कार भावी संतान को धर्मशील, तेजस्वी और स्थिरचित्त बनाने के लिए किया जाता है।”
गर्भ के तीसरे महीने में, जब भ्रूण में इंद्रियों का विकास प्रारंभ हुआ, उसी शुभ काल में आचार्य शिवदत्त जी को आमंत्रित किया गया। घर के आँगन में वेद-मंत्रों की गूँज उठी —
“ॐ गर्भं धेहि सिन्नवः, पुंसवानं भव।”
चारों ओर तुलसी, आम और आंवले की सुगंध फैली हुई थी।
आचार्य जी ने ईशा के मस्तक पर कुश-जल से आशीर्वाद देते हुए कहा —
“हे मातृशक्ति, तुम्हारे गर्भ में जो जीवन पल रहा है, वह धर्म, ज्ञान और करुणा का दीप बने।”
वह क्षण घर में दिव्य शांति का अनुभव बनकर छा गया।
संस्कार के बाद आचार्य जी ने ईशा को स्नेहपूर्वक समझाया —
“अब इस शिशु को केवल भोजन नहीं, बल्कि मनोवृत्ति का पोषण चाहिए।
तुम्हारे विचार, वाणी और आचरण ही उसके संस्कार का आधार बनेंगे।”
ईशा ने अपनी दिनचर्या को तपस्विनी साधना में बदल लिया।
हर सुबह गायत्री मंत्र का जप करती, दिन में मधुर संगीत सुनती और सायंकाल तुलसी के पास दीप जलाकर प्रार्थना करती। उसके हृदय में शांति, करुणा और शुभकामना के भाव उमड़ते रहते।
आदित्य ने भी घर के वातावरण को सात्त्विक बनाए रखने का संकल्प लिया।
उसने कहा —
“हमारा बच्चा हमारे मनों का प्रतिबिंब होगा। इसलिए हमें हर क्षण प्रेम, संयम और प्रसन्नता से होगा।”
घर में किसी प्रकार की कटुता या असंयम न हो, इसका वह विशेष ध्यान रखता। सुमित्रा देवी नित्य वेदपाठ करतीं और घर का वातावरण एक छोटे यज्ञशाला-सा पवित्र बन गया था।
दिन बीतते गए और ईशा के भीतर जीवन की कोंपल संस्कार और सात्त्विकता के साथ बढ़ती गई। वह अब केवल माँ नहीं, एक साधिका बन गई थी। कभी वह वीणा की मधुर धुन सुनती, कभी धार्मिक ग्रंथों का पठन करती। एक दिन उसने अपने भीतर हल्की सी गति महसूस की और मन में कहा —
“यह केवल स्पंदन नहीं, यह तो जीवन का प्रत्युत्तर है।”
उसे लगा जैसे गर्भस्थ शिशु भी उसकी साधना में सहभागी बन गया हो।
नौ महीने पश्चात्, श्रावण मास की शुभ संध्या को शिशु का जन्म हुआ। आकाश में बादल गरज रहे थे, पर वातावरण में अद्भुत शांति थी। बालक का मुख तेजस्वी था और नेत्रों में गहरी स्थिरता थी। आचार्य शिवदत्त जी ने शिशु को देखकर कहा —
“यह केवल जन्म नहीं, यह संस्कार का फल है। यह बालक केवल तुम्हारा नहीं, समाज का दीप बनेगा।”
बालक का नाम आर्यन रखा गया। जैसे-जैसे वह बड़ा हुआ, उसके व्यक्तित्व में असामान्य संतुलन और करुणा झलकती रही। वह पढ़ाई में कुशाग्र था, पर साथ ही विनम्र और सहृदय भी। गाँव के लोग कहते — “इस बालक में कुछ दिव्यता है, जैसे किसी साधना का प्रतिफल हो।”
वर्षों बाद आर्यन चिकित्सक बना, पर वह केवल शरीर का नहीं, आत्मा का वैद्य था।
वह रोगियों से कहता —
“स्वास्थ्य केवल दवा से नहीं, विचार से बनता है।”
जब लोग उससे उसके जीवन की गहराई पूछते, तो वह मुस्कराकर कहता —
“मेरी माँ ने मुझे जन्म से पहले ही संस्कारित कर दिया था। मैं गर्भ में ही धर्म और करुणा का शिष्य बन गया था।”
यह कहानी बताती है कि पुंसवन संस्कार केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भावी पीढ़ी के चरित्र, विचार और चेतना का आधार है। जब माता-पिता अपने जीवन में सात्त्विकता, संयम और सकारात्मकता का संचार करते हैं, तब अगली पीढ़ी केवल देह से नहीं, बल्कि धर्म, विवेक और मानवता से भी समृद्ध होती है। यही है — सच्चा पुंसवन संस्कार।
योगेश गहतोड़ी “यश”













