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संघ से सत्ता तक का सफर

संघ की शाखा से उठी थी ज्योति,
सेवा में बीता हर एक दिवस और रात्रि।
जिसने कहा — “सत्ता नहीं, सेवा ही धर्म,”
वही बना राजनीति का पावन कर्म।

सन् सत्तासी का वो एक वर्ष महान,
भा.ज.पा. में रखे सेवा के अरमान।
गुजरात की धरती पर बोया बीज,
जहाँ संघर्ष था, वहीं खिला संजीव।

कार्यकर्ता बना, संगठन मंत्री कहलाया,
ग्राम से नगर तक संदेश पहुँचाया।
अनुशासन, श्रम और विश्वास का दीप,
युवाओं में भरा समर्पण का सीप।

राम जन्मभूमि की जब बही लहर,
मोदी थे वहाँ, जैसे दीपक अमर।
आडवाणी संग चले देशभर में,
जगाई आस्था हर हृदय के घर में।

दिल्ली बुलाया, नई राह मिली,
रणनीति की शक्ति से पहचान खिली।
न लड़ा चुनाव, पर बन गया मस्तिष्क,
हर विजय के पीछे उसका दृष्टि-दृष्टि।

उत्तर के पर्वतों में पहुँचाया प्रकाश,
हिमालय से हरियाणा तक था प्रयास।
“शब्द कम, कर्म अधिक” उनका मंत्र,
हर कार्य में झलके भारत का केंद्र।

सन् दो हजार एक, गुजरात पुकारा,
भूकंप ने राज्य को था झकझोरा।
आडवाणी-अटल ने विश्वास जताया,
मोदी को नेतृत्व का ताज पहनाया।

सात अक्टूबर को इतिहास लिखा गया,
वडनगर का बालक शिखर चढ़ गया।
संघ का प्रचारक, अब जन-सेवक महान,
भारत के हृदय में स्थायी स्थान।


ना मांगा पद, ना सत्ता का मान,
केवल किया कर्म, यही पहचान।
सिखाया उसने जग को ये सदा —
“निष्ठा हो तो विनम्रता भी नेतृत्व बन जाए बड़ा।”

आर एस लॉस्टम

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