
किस मिट्टी का बना है ये इंसान,
लोहे सा मज़बूत, अडिग, महान।
तूफानों में भी अचल खड़ा,
हर वार झेलकर भी अड़ा।
गालियाँ दीं, तो मुस्कुराया,
बुराइयों ने भी सिर झुकाया।
जिसे कहा गया “मावली”, “ढोंगी”, “देशद्रोही”,
वो फिर भी देश की बात करता रहा,
हर ज़ख्म को फूल समझकर सहता रहा।
भोलेनाथ भी सोच में पड़ गए,
काशी में बैठे मन में कह गए
“कौन सी मिट्टी थी वो,
जो मैंने गूंथी थी इसमें?
क्यों ये इंसान टूटता नहीं,
थकता नहीं, झुकता नहीं?”
ये चलता है अपनी धुन में,
सपनों की अग्नि लिए तन-मन में।
खुद के लिए नहीं, देश के लिए जीता,
हर दर्द को हंसकर सीता।
ना रुकता है, ना थमता है,
बस कर्म में रम जाता है।
लोहे का नहीं — ये तो आग का बना है,
जिसे जितना ठोको, उतना तप जाता है।
भोले भी मुस्कुराकर बोले,
“ये मेरी मिट्टी का नतीजा है,
जिसमें विश्वास, साहस और भक्ति है।
ये इंसान नहीं, संकल्प का रूप है
जिसे कोई शक्ति तोड़ नहीं सकती है।”
“किस मिट्टी का बना है ये इंसान,
जो हर हार में भी रखता है सम्मान।”
आर एस लॉस्टम













