
मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदु:खपुण्यापुण्य विषयाणां भावनातश्चित्त प्रसादनम् ।
सुखदु:खपुण्यापुण्यविषयाणाम्= सुखी, दु:खी, पुण्यात्मा और पापात्मा– ये चारों जिनके क्रम से विषय हैं ऐसी; मैत्रीकरकरुणा मुदितोपेक्षाणाम्= मित्रता, दया, प्रसन्नता और उपेक्षा की; भावनात:= भावना से; चित्तप्रसादनम्= चित्त स्वच्छ हो जाता है ।
अनुवाद– सुखी जनों से मित्रता, दुखियों पर दया, पुण्य आत्माओं में हर्ष और पापियों से अपेक्षा की भावना से चित्त प्रसन्न होता है ।।
व्याख्या– चित्त सत्व,रज तथा तम गुणों से गठित हुआ है इसलिए इसमें तीनों गुण विद्यमान है । यह सत्य गुण ही विद्या है तथा तमोगुण अविद्या ।
सामान्य मनुष्य में दोनों विद्यमान हैं । इन गुणों के ही कारण चित्त वृत्तियां बनती हैं जिनकी तरंगे मनुष्य जीवन को प्रभावित करती हैं तमोगुण युक्त वृत्ति विपर्यय कहलाती है । अनेक जन्म की भोग वृत्ति के कारण निमित्त संस्कार मनुष्य को सदा भोगों की ओर ही आकर्षित करते हैं । इसका मुख्य कारण अहंकार है ।
मनुष्य को सबसे बड़ा भ्रम यही है कि मैं अलग हूँ, सृष्टि से भिन्न मेरा आस्तित्व है, अन्य से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं,
यह सृष्टि एक इकाई नहीं है बल्कि अनेक इकाइयों का संगठन मात्र है । इसी अहंकार के कारण कई धर्मों ने आत्माओं को भी अनेक मान लिया । अहंकार के गिरे बिना अद्वैत की उपलब्धि नहीं हो सकती । योग साधक को चाहिए कि विद्या रूपी गुणों का विकास करे तथा अविद्या आदि दोषों को दूर करे ।
मित्रता, दया, हर्ष, करुणा, अहिंसा आदि विद्या हैं तथा राग, द्वेष, हिंसा, घृणा, निद्रा आदि अविद्या हैं ।
विद्या आदि गुणों के सेवन से चित्त प्रसन्न होकर निर्मल होता है जिससे वह शान्त हो जाता है किन्तु अविद्या आदि दोषों से वह और कलुषित होता है जिससे वह नित्य नई-नई चिताओं और दु:खों से ग्रस्त रहता है । ऐसा चित्त कभी शांत नहीं हो सकता । यह विद्या आदि दोष केवल व्यक्ति के अहंकार को दुष्ट करते हैं किंतु उसे आत्मज्ञान से वन्चित कर देते हैं ।
ये ऐसे अवगुण है जो-- *दूसरे का कुछ भी अहित नहीं कर सकते बल्कि स्वयं का अहित अवश्य करते हैं ।*
सबकी निंदा करके वे अपने लिए गुणों के द्वारा ही बंद कर देते हैं । हमेशा निन्दा, घृणा, ईर्ष्या से भरा चित्त भी वैसा ही हो जाता है, क्योंकि उसके सारे संस्कार– विचार एवं भावना से ही बनते हैं ।
इसलिए पतंजलि चित्त की निर्मलता के लिए विधायक {पॉजिटिव} तत्वों की बात कहते हैं कि– सुखीजनों से मित्रता करना, दु:खियों पर दया करना, पुण्यात्मा पुरुषों में प्रसन्नता की भावना करना तथा पपियों में उपेक्षा की भावना करने से चित्त प्रसन्न और निर्मल होता है ।
जब तक चित्त निर्मल नहीं होता तब तक वह अशान्त बना ही रहेगा । ऐसे चित्त वाले को आत्मज्ञान का फल नहीं मिल सकता । इन विधायक तत्वों से ही साधक शुद्धता को प्राप्त होता है । इनसे घृणा, ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध आदि मलों का अपने आप नाश हो जाता है ।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार













