
एक गाँव में मधुसूदन और उनकी पत्नी गौरी के घर तीन महीने पहले एक कन्या का जन्म हुआ था। आज उस कन्या “आराध्या” का निष्क्रमण संस्कार होना था। आँगन में हल्की-सी धूप उतर रही थी। आज का दिन विशेष था, क्योंकि यह वह अवसर था जब शिशु को पहली बार प्रकृति, सूर्य, वायु, आकाश और जल के सान्निध्य में ले जाया जाता है।
अब कुछ देर बाद कुल पुरोहित आचार्य सोमदत्त जी घर पहुँचे। मधुसूदन और गौरी ने उनका आदरपूर्वक स्वागत किया। आचार्य जी अपने साथ पूजा की थाली लेकर आए थे, जिसमें दीपक, हल्दी, चावल, गंगाजल और ताम्र-कलश रखा हुआ था।
मधुसूदन ने नतमस्तक होकर विनम्रता से पूछा —
“आचार्य जी, कृपया बताइए कि निष्क्रमण संस्कार का अर्थ क्या है?”
आचार्य जी मुस्कुराए और उत्तर दिया —
“बेटा, ‘निष्क्रमण’ का अर्थ है — पहली बार तीन महीने बाद बच्चे का बाहर जाना।
इस संस्कार में बच्चा घर की सीमा से बाहर निकलकर प्रकृति के संपर्क में आता है। प्रकृति ही उसकी पहले गुरु हैं।”
इसके साथ ही आचार्य जी ने सूर्यदेव का ध्यान करते हुए श्लोक उच्चारित किया —
“ॐ आदित्याय विद्महे दिवाकराय धीमहि।
तन्नो सूर्यः प्रचोदयात्॥”
(अर्थ: हम सूर्यदेव का ध्यान करते हैं, वे हमें प्रकाश और ऊर्जा प्रदान करें।)
गौरी ने जिज्ञासापूर्वक पूछा —
“क्या यह संस्कार शास्त्रों में वर्णित है?”
आचार्य जी ने गंगाजल कलश में डालते हुए कहा —
“हाँ बेटी, शास्त्रों में उल्लेख है कि सूर्य का तेज और वायु का स्पर्श बच्चे के स्वास्थ्य और विकास के लिए अत्यंत शुभ होता है।”
फिर उन्होंने शास्त्र स्मरण कराते हुए कहा —
“सूर्याद् भवति तेजस्वी, वायोः प्राणवलं तथा।”
(सूर्य से तेज मिलता है और वायु से प्राणों में बल आता है।)
पूजा की तैयारी प्रारम्भ हुई। आचार्य जी ने गौरी से कहा —
“बेटी, बच्ची को स्नान कराओ, साफ कपड़े पहनाओ और उसके माथे पर हल्का तिलक लगाओ।”
गौरी ने “आराध्या” को स्नान कराते हुए प्यार से कहा —
“आज तुम पहली बार इस सुंदर दुनिया को देखने जा रही हो।”
स्नान के बाद आचार्य जी ने दीप प्रज्वलित किया और पवित्र गायत्री मंत्र का उच्चारण किया —
“ॐ भूर्भुवः स्वः
तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात्॥”
(अर्थ: हम उस परम प्रकाश, परम तेजस्वी ईश्वर का ध्यान करते हैं; वही हमारी बुद्धि को सही मार्ग पर प्रेरित करे।)
अब आचार्य जी ने मधुसूदन से कहा —
“बच्ची को माँ की गोद में लेकर घर की दहलीज़ की ओर बढ़ो। दहलीज़ पार करने का यही क्षण ‘निष्क्रमण’ कहलाता है।”
गौरी ने आराध्या को गोद में लिया और मुख्य द्वार की ओर बढ़ीं। जैसे ही वे दहलीज़ पर पहुँचीं, आचार्य जी ने पवित्र मंत्र बोला —
“ॐ अश्विनोर्बा हातनु नः।”
(हे देवों! इस शिशु को स्वास्थ्य और सुरक्षा प्रदान करें।)
जैसे ही बाहर की ताज़ा हवा आराध्या के चेहरे को छूती है, तो वह हल्की-सी मुस्कुरा देती है।
आचार्य जी प्रसन्न होकर कहते हैं —
“देखो, प्रकृति स्वयं इसका स्वागत कर रही है।”
सब लोग बाहर आँगन में पहुँचे। पक्षियों की चहचहाहट, हल्की धूप और मंद हवा जैसे इस पवित्र क्षण के साक्षी थे।
गौरी ने विस्मय से कहा —
“लगता है पूरी प्रकृति उसे आशीर्वाद दे रही है।”
आचार्य जी ने कलश से गंगाजल लेकर आकाश की ओर छिड़का और बोले —
“अप्सु अन्तरं तव तेजः प्राणाः।”
(जल के माध्यम से जीवन की ऊर्जा प्रवाहित होती है।)
फिर उन्होंने गौरी को बच्ची को हल्का ऊपर उठाने को कहा।
गौरी ने धीरे से आराध्या को आसमान की ओर उठाया।
सूर्य की कोमल किरण उसके चेहरे पर पड़ी और वह सुमधुर रूप में मुस्कुरा दी।
आचार्य जी ने आशीर्वाद देते हुए कहा —
“दीर्घायुः पुत्री भव।”
(बेटी, तुम दीर्घायु हो।)
फिर बोले —
“अब संस्कार पूर्ण हुआ। आज से प्रकृति ही इसकी पहली गुरु है।” इस शुभ अवसर से परिवार हर्ष और उत्साह से भर गया।
उस दिन से गौरी प्रतिदिन आराध्या को सुबह की धूप, हवा और प्रकृति के बीच कुछ समय के लिए अवश्य ले जाने लगी।
अर्थात निष्क्रमण संस्कार केवल बाहर जाना नहीं, बल्कि प्रकृति से जुड़ने और संसार को पहचानने का पहला कदम है।
धूप की पहली किरण, जीवन की पहली सीख,
प्रकृति बने गुरु, तब खुल जाए जीवन की रेख।
घर से बाहर निकलता है, भविष्य का आकार,
निष्क्रमण संस्कार देता है, स्वतंत्रता का उपहार।
योगेश गहतोड़ी “यश”













