
जी मैं खाली बोतल ही तो हूॅं ,
मुझमें चाहे जो कुछ भर लो ।
अमृत भर लो जहर भर लो ,
जैसी मर्जी वैसा ही कर लो ।।
चाहे जीवन हेतु भर वरदान ,
या जीवन हेतु अभिशाप भर ।
जीवन पथ प्रशस्त तो कर ले ,
यहाॅं नहीं तेरा मेरा कोई घर ।।
मरना है तुझे जीवन जीकर ,
या जीवन में तुझको मरना है ।
भर लो चाहे जो कुछ मुझमें ,
न्याय अन्याय तुझको वरना है ।।
अंदर की वायु कर दो बाहर ,
भर दो उसमें तुम चाहे नाहर ।
चाहे भर दो तपती धूप तुम ,
चाहे भर दो तुम उसमें छाॅंहर ।।
भर ले मुझमें तू सुगंधित इत्र ,
या भर ले चाहे मुझमें दुर्गंध ।
जीवन है तुम्हारा जैसे जी ले ,
नहीं बना इसमें कोई अनुबंध ।।
जी मैं खाली ही तो बोतल हूॅं ,
भर ले मुझमें तू काला न्याय ।
काक जीवन तो है बदनाम ,
हंस सा बना सफेद अन्याय ।।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार













