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पुंसवन संस्कार

जब गर्भ में जीवन की आहट हल्के स्वर में आई,
धरती ने ली अंगड़ाई, नभ में हँसी समाई।
माँ की आँखों में श्रद्धा, मन में उठी प्रार्थना,
ईश्वर ने भेजा वरदान — नव जीवन की कामना॥

वेदों की वाणी गूँजी, मंत्रों ने दिया आह्वान,
पुंसवन वह क्षण बना — जब उतरा ब्रह्म-ज्ञान।
माँ ने ध्यान धरा हृदय में, पिता ने संकल्प लिया,
सत्वगुणों का बीज वहाँ, प्रेम से बोया गया॥

माँ के मन में भक्ति जगी, हर श्वास बनी प्रार्थना,
हर पल में शुभ विचार खिले, मन था पूर्ण साधना।
भोजन, वाणी, कर्म सभी स्नेह-संयम से भरे,
माँ ने गर्भ को गढ़ा वहाँ — जैसे जल में घट धरे॥

पिता हुए श्रद्धा में मग्न, बोले मंद स्वर,
“हे प्रभु! संतान में हो तेज, हो सत्य का समर।”
उसके हर कर्म में उजियारा, हर सोच में सद्भाव,
संतति बने मानवता का सच्चा सुंदर भाव॥

जल ने दी शीतलता वहाँ, अग्नि ने दी ऊष्मा,
वायु बनी प्राणधारा, सुरभित हुई दिशा।
धरती ने दी स्थिरता, नभ ने दिया विस्तार,
पंचतत्व मिलकर रच गए — सृष्टि का आधार॥

गर्भ में गूँजे जब मंत्र, उज्ज्वल हुआ अंतःकरण,
माँ की हर धड़कन में था — सत्यमय स्पंदन।
हर ध्वनि बनी आशीष नयी, हर विचार बना जीवन,
पुंसवन ने रच दिया वहाँ — चेतन का प्रथम सृजन॥

यह केवल संस्कार नहीं, यह आत्मा की दीक्षा है,
माँ-पिता के मन में समायी, ईश्वर की शिक्षा है।
संयम, श्रद्धा, प्रेम जहाँ, गर्भ बने उपवन,
जन्मे वहाँ वह बालक जो — हो जग का आलोक-पवन॥

माँ के आँचल में दया, पिता के मन में बल,
दोनों मिल जपते रहे — “हो जीवन निर्मल।”
वेदों का यह पावन स्वर, सृष्टि करे साकार,
पुंसवन संस्कार सिखाए — “गर्भ ही पहला संसार॥”

योगेश गहतोड़ी “यश”

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