
विशोका वा ज्योतिष्मती ।
वा= इसके सिवा {यदि}; विशोका= शोक रहित; ज्योतिष्मती= ज्योतिष्मती प्रवृत्ति {उत्पन्न हो जाए तो वह} भी मन की स्थिति करने वाली होती है ।
अनुवाद– इसके सिवाय शोक रहित प्रकाश वाली प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाए तो वह भी मन की स्थिति को बाँधने वाली होती है । {मन को स्थिर करने वाली होती है} ।
व्याख्या– इस सूत्र में बताया गया है कि इन पाँच विषय वाली प्रवृत्तियों के सिवाय ज्योतिष्मती प्रवृत्ति के उत्पन्न होने से साधक को भीतर का प्रकाश दिखाई देने लगता है। यह प्रकाश आत्मा का ही प्रकाश है जो सूर्य, चन्द्रमा आदि के प्रकाश से सर्वथा भिन्न होता है । यह शोक रहित होता है । इससे भी साधक की रुचि बढ़ जाती है । चित्त की निर्मलता होने पर अथवा हृदय कमल में ध्यान करने से यह भी प्रकाश दिखाई देता है । वैसे विषय वाली प्रवृत्ति में भी प्रकाश दिखाई देता है किंतु यह प्रकाश अधिक स्थिरता वाला, शोक रहित तथा शान्त होता है ।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार













