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समाधिपाद सूत्र– ३७

  

वीतराग विषयं वा चित्तम ।

वीतरागविषयम्= वीतराग को विषय करने वाला; चित्तम; चित्त; वा= भी {स्थिर हो जाता है} ।

अनुवाद– अथवा– रागद्वेष रहित महात्माओं के शुभ चरित्र का ध्यान करने से भी मन स्थिर होता है ।
व्याख्या– यहाँ मन को स्थित करने का एक और उपाय बताया गया है कि जिस महात्मा के राग द्वेष सर्वथा नष्ट हो गए हैं ऐसे बीतरागी का ध्यान करने से भी मन स्थिर हो जाता है ।
चित्त में जो कुछ भरा हुआ है उसकी विचार तरंगे उठती हैं । ये विचार ही मन है । अच्छे बुरे तथा मिश्रित विचार इसमें निरंतर आते रहते हैं । इन विचारों की क्रियान्विति शरीर तथा इंद्रियों के माध्यम से होती है । इसलिए ये विचार ही कर्म के आधार हैं । कर्म के बाद उसका अच्छा बुरा फल होता है जो पुनः चित्त तक पहुंचता है । इससे फिर नये विचार उत्पन्न होते हैं ।
यह दुष्ट चक्र जन्मों-जन्मो तक चलता रहता है एवं चित्त में निरंतर विक्षेप बने रहते हैं । चित्त को शांत करने के लिए इसे पहले नकारात्मक से विधायक {पॉजिटिव} की ओर लगाना चाहिए, विध्वंस से निर्माण की ओर लगाना चाहिए ।
उसके बाद विधायक {चिन्तन} का भी निषेध कर देना चाहिए तभी पूर्ण शांति होती है । इसके कई उपाय पूर्व में बताए गए हैं यहाँ बीतरागी महात्मा के ध्यान करने को कहा गया है । हम जिस प्रकार के व्यक्ति का ध्यान करते हैं वैसे ही हमारे विचार बन जाते हैं क्योंकि उसकी अदृश्य विचार तरंगे हमारे मन को प्रभावित करती हैं । महापुरुषों, वीरों, बलिदानियों, संतों, महात्माओं अथवा चोरों डाकुओं, अत्याचारियों आदि में से जिन पर हम विचार करते हैं अथवा साहित्य पढ़ते हैं अथवा सुनते हैं तो हमारा मानस भी वैसा ही बन जाता है ।
यह मनोवैज्ञानिक सत्य है । इसलिए योग साधक को सदैव वीतरागी महात्माओं का ध्यान करना चाहिए तथा उन्हीं का साहित्य भी पढ़ना चाहिए जिससे स्वयं का चित्त निर्मल होकर स्थिर होता है । ऐसे महात्माओं का चित्र अथवा मूर्ति आदि को सामने रखकर भी ध्यान किया जा सकता है योग साधन में इसका भी महत्वपूर्ण स्थान है । मंदिरों में मूर्ति स्थापना तथा घरों में महापुरुषों, अवतारों, संतो, महात्माओं के चित्र लगाकर उन पर ध्यान करने की विधि का यही तात्पर्य है ।

स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार

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