Uncategorized
Trending

चूड़ाकर्म संस्कार

सनातन संस्कृति में — संस्कारों का अद्भुत मान,
धर्म, योग, वेद मिलकर — करते जीवन का निर्माण।
सोलह महान संस्कारों में — आठवाँ यह पूजित स्थान,
चूड़ाकर्म कहलाता है — आत्मा का पवित्र प्रमाण।

आमतौर यह संस्कार — एक से तीन वर्ष में होता,
कभी पाँच वर्ष तक भी — परिस्थिति अनुसार संजोता।
कहते मन-बुद्धि जागे — ग्रह-नक्षत्र जब हों साथ,
तब चूड़ाकर्म बने — धर्ममार्ग का शुभ प्रारंभ पाथ।

यह केवल केश कटन नहीं — इसका उद्देश्य महान,
पूर्व-जन्म संस्कारों से — मुक्त करे यह शुभ चरण।
पुरानी वृत्ति मिटे — तब नई चेतना लेती है अवतार,
मन-बुद्धि निर्मल होकर — आत्मा का होता विस्तार।

शुभ मुहूर्त चुना जाता — देखकर ग्रह, तिथि, चंद्र, नक्षत्र,
पंचांग और वेद-वाणी — बनते मार्गदर्शक पवित्र।
जब मंत्रों की पावन ध्वनि में — कटते केश शांत, धीरे-धीरे,
तब संस्कारों की जड़ें — उतरें मन में गंभीरतापूर्वक धीरे।

दूध, दही, घी और शहद — तिल से होता शुभ लेपन,
चित्त रहे शांत, बुद्धि तेज — जागे भीतर का सद्विवेक-चिन्तन।
फिर शिखा की स्थापना — बनती सम्मान की निशानी,
जो स्मृति, शक्ति, ज्ञान — और आत्मबल की है कहानी।

शिखा दर्शाए तीन शक्तियाँ — ब्रह्मा, विष्णु, शिव महान,
सृष्टि, पालन, संहार — तीनों का संतुलित विधान।
ज्योतिष कहता चंद्रमा — मन और भावना का स्वामी,
इसलिए इस संस्कार से — स्मृति बनी निर्मल, अविरामी।

बच्चे को मिलता आरंभ — मन और शरीर का संतुलन,
जागे स्मृति-शक्ति और — विचारों में पवित्र अनुशासन।
भावनाएँ हों स्थिर — चित्त रहे शांत, उजास भरें आकाश,
चूड़ाकर्म से जीवन में — धर्म, ज्ञान और सद्गुणों का विकास।

जीवन तेरा हो मंगलमय — जैसे आरती का उजियारा,
तेरा मन रहे निर्मल, शांत — जैसे चित्त में विराजे सहारा।
गुरु, देव, माता-पिता — दें तुझे ज्ञान, धैर्य और प्रवीणता,
तेरे हर कर्म में बसें — सत्य, शील, धर्म और साधुता।

वर्धित हो बुद्धि और स्मृति — बने तू विनम्र, तेज और दीप,
तेरी वाणी में प्रेम हो — हृदय में करुणा, शुभ संकल्प अतीव।
बढ़े तू सद्गुणों में आगे — धारण कर धर्म का पावन विचार,
तेरे जीवन में संस्कारों का — तेजस्वी, उज्ज्वल, दिव्य आधार।

योगेश गहतोड़ी “यश”

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *