
क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहण ग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनता समापत्ति: ।
क्षीणवृत्ते:= जिसकी समस्त वाह्य वृत्तियाँ क्षीण चुकी हैं ऐसे; मणे: इव अभिजातस्= स्फटिक मणि मणि की भाँति निर्मल चित्त का; ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु= जो ग्रहीता {पुरुष}, ग्रहण {अन्तःकरण और इंद्रियाँ} तथा ग्राह्य- {पंचभूत विषयों-} में; तत्स्थतदञ्जनता= स्थित हो जाना और तदाकार हो जाना है, यही; समापत्ति:= सम्प्रज्ञात समाधि है ।
अनुवाद– जिसकी समस्त बाह्य वृत्तियाँ क्षीण हो चुकी हैं ऐसे स्फटिक मणि की भाँति निर्मल चित्त का ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय में स्थिर एवं तदाकार हो जाना ही ‘सम्प्रज्ञात’ समाधि है ।
व्याख्या– उपर्युक्त विधियों के प्रयोग से जब चित्त की समस्त वाह्य वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं तो उसे मन की स्थिर अवस्था कहते हैं ।
वाह्य वृत्तियों के कारण ही चित्त तरंगित रहता है जिनके कारण आत्मा का बिम्ब दिखाई नहीं देता । ये तरंगे ही उस पर जमी हुई धूलि हैं जो साफ हो जाती हैं तो चित्त स्फटिक मणि की भाँति निर्मल हो जाता है ।
चित्त की ऐसी निर्मल अवस्था में ग्रहीता अर्थात् {आत्मा}, ग्रहण अर्थात् {अन्तःकरण और इंद्रियाँ}तथा ग्राह्य अर्थात् {पंचभूत तथा विषयों} में अर्थात् ज्ञाता ज्ञान और ज्ञेय में स्थित और तदाकार हो जाता है ।
इसी को समापत्ति अर्थात सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं । इस स्थिति में मन पूर्ण नियन्त्रण में होता है तथा उसे जिस वस्तु में स्थिर किया जाए उसी के तदाकर हो जाता है यही शुद्ध मन की अवस्था है ।
यह चित्त वासना की तरंगों के कारण ही विषयों की ओर भागता था किन्तु अब यह पंखहीन पक्षी की भाँति हो जाता है जो वासना के पंखों के टूट जाने से उड़ नहीं सकता । इस ‘क्षीण वृत्ति चित्त’ कहा जाता है ।
यही इसका सच्चा स्वभाव है । वृत्तियाँ तो अविद्या के कारण थीं । अब यह केवल दृष्टा मात्र रह जाता है । तटस्थ होकर सब देखता रहता है ।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ला हरिद्वार













