Uncategorized
Trending

दीपक


रही भावना यही कभी मैं,
दीपक जैसा चमकूँ ।
कभी कहीं फिर मेघ घटा बीच,
सरिस दामिनी दमकूँ ।।

कतरा कतरा जल कर भी मैं,
रोशन जग कर जाऊँ।
मुझसे भी गर तम मिट जाए,
खुशी खुशी तर जाऊँ।।

आंगन देहरी पूजा घर में,
जहाँ कहीं भी जाऊँ,
बड़े नेह से लोग धरे,
तब रह रह कर इठलाऊँ।।

बूंद बूंद मैं घी भर लाऊं,
तेज करूं फिर बाती,
आभा प्रभा बिखेरूं पल पल,
रहूं खुद पर इतराती।।

अमित पाठक शाकद्वीपी

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *