
धरती आबा बिरसा मुंडा,
वीर सपूत थे न्यारे।
जल,जंगल,ज़मीन के खातिर,
प्राण दिए थे सारे।।
उलीहातू की पावन माटी में,
पंद्रह नवंबर को जन्म लिया।
सुगना और कर्मी का बेटा,
किस्मत का दीपक बल दिया।
देखा शोषण,देखा दुखड़ा,
आदिवासियों का था हाल,
भेदभाव की आग जली थी,
सहम रहा था हर इक भाल।
शिक्षा और वैचारिक क्रांति
मिशनरी स्कूल में सीख मिली,
पर मन में विद्रोह भरा।
देखा धर्म का छल-कपट भी,
जब हक छीना,मन था डरा।
झाड़-फूँक,पाखंड को छोड़ा,
सत्य की राह को अपनाया।
बिरसायत का बीज बोया,
‘सिंग बोगा’ को ही ध्याया।
उलगुलान ललकारा ज़मींदारों को,
अंग्रेजों को भी चुनौती दी।
बंद करो यह अत्याचार अब,
‘उलगुलान’ की रणभेरी थी।
जन-जन को किया इकट्ठा,
वनवासियों का नेता बन,
न्याय दिलाने को ठानी,
रण में कूद पड़े थे जन।
तीर-कमान,हाथों में लेकर,
अन्याय से किया संग्राम।
वीर बिरसा का यह संघर्ष,
अमर हुआ उनका नाम।
बलिदान और अमरत्व,
छोटा नागपुर की धरती पर,
क्रांति की मशाल जलाई।
धोखे से पकड़े गए वो,
किस्मत ने ली अंगड़ाई।
जेल की काल-कोठरी में,
बीमारी ने घेरा डाल,
पच्चीस साल की उम्र में,
वीर बिरसा ने त्यागे प्राण।
बिरसा मुंडा अमर रहेंगे,
हर संघर्ष की कहानी में।
आज भी उनकी गूँज है बाकी,
हर दिल की निशानी में।
धरती आबा बिरसा मुंडा,
वीर सपूत थे न्यारे।
जल, जंगल,ज़मीन के खातिर,
प्राण दिए थे सारे।।
रीना पटले(शिक्षिका)
शास हाई स्कूल ऐरमा (कुरई)
जिला- सिवनी मध्यप्रदेश













