
प्रकृति ही तो है जननी!
जो वात्सल्य ही लुटाती है।
चूमती कर कमलों में रखकर
निज अंक में भर लेती है।
लिए नवांकुर हाथों में !
नेहा सुधा बरसाती है ।
ममता से अभिसिंचित कर
बढ़ने को प्रेरित करती है।
देख शिशु की कोमलता !
खुद भी भाव विभोर हो जाती है।
मुस्काती स्पर्श से उसके !
बन फूल खुशबू सी महकाती है।
ज्यों अधरों पर आई मुस्कान उसकी!
मानो खिल गया पूरा उपवन ।
पल्लवित हुई लता- पताएं
धरा संग झूम उठा नीला गगन।
उर्मिला ढौंडियाल’उर्मि’
देहरादून (उत्तराखंड)













