
ये दुनिया रंगमंच है या कोई रैन-बसेरा?
लोग आते हैं, कुछ पल ठहरते हैं, और फिर चले जाते हैं।
कुछ यादें देकर जाते हैं, कुछ यादें साथ ले जाते हैं…
आख़िर ये दुनिया भीड़ है
या हम ही अपने भीतर अकेले हैं?
उधार की ज़िंदगी जीते हैं,
और खुद को जमींदार समझे बैठे हैं।
सच में यहाँ इंसान कहाँ जीते हैं
कौन है जो सचमुच ज़िंदा है,
और कौन है जो यहाँ अपना सगा कहलाता है?
साम तो यूँ ही बदनाम है,
चलन तो दिन का बदला है।
रात का ढलना भी कोई ढलना है?
चलन तो असल में दिन के बदलने का है।
लोग कहते हैं रंग अपने रंग बदलते हैं,
पर सच तो यह है बदलते तो इंसान हैं।
पर्वतों के भार से आसमान दब रहा है,
धरती को जल अपनी आग से खा रहा है।
क्या चाँद–सूरज का भी कोई अपना अस्तित्व है,
या वे भी यूँ ही बहते चले जा रहे हैं
समय की अनदेखी धाराओं में खोते हुए?
क्या हवाओं के भी पंख होते हैं,
या वे बिना पंख के ही उड़ा ले जाती हैं?
पंछियों के घोंसलों का क्या कसूर था,
जो तूफ़ान उन्हें उड़ा ले गया?
वो रहनुमा— पर्वतों का रहमदिल,
ख़ुद ही शायद राह भटक गया,
इसीलिए शायद नदियों का रूप भी बदल गया।
सैलाब में दब गई इंसानियत की चीखें,
कितने ही लोग जल-प्रलय में
अपने ही घरों में बिखर गए।
आजकल वो ढूँढता फिरता है अपना आशियाना, कौन जाने किस दरिया ने उसे निगल लिया।
आर एस लॉस्टम













