
निशदिन गिनूँ मैं तारे,
पूछूँ पवन से बात।
कहाँ गए मेरे साजन,
क्यों कटती नहीं ये रात?
सूखे हुए पात से जैसे,
मन मेरा है मुरझाया।
तुम बिन ये उपवन भी,
लगता है मुझे पराया।
विरह की ये ज्वाला,
तन को दग्ध करे।
शीतल चाँदनी भी आज,
मुझको तप्त करे।
पंख नहीं हैं मेरे पास,
के उड़कर मैं आ जाऊँ।
मन की इस पीड़ा को,
किसको मैं बतलाऊँ?
पलकों के इन आँसूओं से,
भीगी मेरी चुनरिया।
आओ प्रिय!अब तो आ जाओ,
थामो इस जीवन की डगरिया।













