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कलियुग

कलियुग का ये दौर अजीब,
सत्य यहाँ बन गया फ़ज़ीब।
ईमान बिके सस्ती बोली,
झूठ चले बाज़ी की टोली।

मानव तन में पाप बसे हैं,
चेहरों पर सबके मास्क लगे हैं।
आज धर्म की बातें सब करते,
कर्म मगर उल्टे-पुल्टे करते।

रिश्तों में अब भाव नहीं,
दिल में ज़रा लगाव नहीं।
सबको अपने मतलब में देखा,
लोभ और छल ने मन को लेखा।

सोने की दुनिया, पत्थर दिल,
हँसी दिखे पर अंदर शिल।
नेत्रों में है, ईर्ष्या के अंगारे,
बातों में छल-कपट के धारे।

भगवान की पूजा में स्वार्थ,
नहीं रह गया अब परमार्थ।
भक्ति का केवल प्रदर्शन,
आचरण में भ्रम का चलन।

ज्ञान किताबों में कैद पड़ा,
जीवन में बस जंजाल बड़ा।
मनुष्य अगर थोड़ा रुक जाए,
अंतरमन का दीप जलाए।

कलियुग भी बदला जा सकता,
जब मन स्वयं को पहचानता।
सबको अपने सीने लगा ले,
भक्ति को हृदय में स्थान दे।

इस युग की दवा बस एक,
नित प्रेम, सत्य और ध्यान रहे।
जिस दिन जन ये सीख गया,
मानव भवसागर पार गया।

योगेश गहतोड़ी “यश”

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