
सूखा धरती म कदम के निशान,
पैर थरथरावत हे, आखिरी घूँट के आस म।
मोह के बेड़ी अब टूटत हे,
पर दिल के कोना म तोर नाम चुभत हे।
पनघट सूना, कुआँ के पानी म
तोरे चेहरा के परछाईं डूबत-उभरत हे।
हर लहर म तोरे आहट के गूँज,
पुरान लोरी बनके आँखिन म चुभत हे।
वह आखिरी पनघट, जहाँ हमन मिले रहेंव,
अब वीरान हे, हवा म तोरे खुशबू बाकी।
हाथ म कलश, पर पानी नइ,
बस आँसू के बूँद टपकत हे, काँपत हे।
कोन कहिथे विदा होगे मोह के डोर,
हर रात म तोर सपना आँखिन ला भिगोवत हे।
प्रेम के आगी म जलत-जलत,
राख बनत हे, पर आँसू नइ सूखत हे।
पनघट म खड़े, आँखिन म आँसू के नदी,
हर बूँद म तोर नाम लिखत हे।
दर्द इतना गहिर, कि साँस रुकत हे,
फिर भी जीयत हे, तोर याद म मरत हे।
कौशल…













