
सूक्ष्म विषयत्वं चाऽलिंग पर्यवसानम् ।
च= तथा; सूक्ष्मविषयत्वम्= सूक्ष्मविषयता; आलिङ्गपर्यवसानम्= प्रकृति पर्यंत है ।
अनुवाद– और सूक्ष्म विषयता आलिंग प्रकृतिपर्यन्त है ।
व्याख्या– सृष्टि के स्थूल विषय हैं– पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तथा इनसे सूक्ष्म है पृथ्वी की गंध, जल का रस, अग्नि का रूप, वायु का स्पर्श और आकाश का शब्द । इन्हें तन्मात्राएँ भी कहते हैं ।
इन सब का तथा मन एवं इन्द्रियों से सूक्ष्म ‘अहंकार’ है । अहंकार से सूक्ष्म महत्तत्व है जो लिंग मात्र है और महत्तत्व से सूक्ष्म ‘प्रकृति’ है जो अलिंग स्वरूप है । इस क्रम से सूक्ष्म से ही स्थूल का निर्माण हुआ है किंतु ये सब प्रकृति जन्य है । यह ‘प्रकृति’ सूक्ष्मता ही अवधि है ।
इन पंचतत्वों से लेकर प्रकृति पर्यंत किसी भी पदार्थ को लक्ष्य बनाकर उनमें की गई समाधि को ‘सविचार’ और ‘निर्विचार’ समाधि कहते हैं ।
पुरुष {आत्मा} इस प्रकृति से भी सूक्ष्म है । यह इंद्रिय ग्राह्य नहीं है तथा यह दृश्य पदार्थों में भी नहीं है । समाधि में तो कुछ दिखाई देता है वह सब प्रकृति ही है । यह कारण रूप प्रकृति अव्यक्त {शून्य} है । समाधि में शून्य का आभास होना इस प्रकृति का आभास है जो सृष्टि का कारण है । इससे भिन्न वह चेतन तत्व {पुरुष} है जिसके संयोग के बिना प्रकृति अपना कार्य नहीं कर सकती तथा प्रकृति के बिना वह चैतन्य क्रियाहीन है । चेतन का सारा कार्य प्रकृति के माध्यम से ही होता है ।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ला हरिद्वार













