कलयुग

शीर्षक-रिश्तों का पतन
और कितना गिरेगा इंसान,
कब तक ये आँखें मूँदेगा?
खुदगर्जी के इस अंधेरे में,
अपनों को कब तक यूँ ढूँढेगा?
रिश्तों का हर धागा टूटा,
हर वादा आज यहाँ हैं झूठा,
कलयुग का है ये कैसा फेरा,
हर दिल आज यहाँ है रूठा।
मीठे बोल अब ज़हर लगे हैं,
मतलब के सब यार खड़े हैं,
बाज़ारू हुए सारे नाते,
बिकते हुए अब घर-बार पड़े हैं।
अब भाई से भाई डरता है,
विरासत के लिए लड़ता है,
पवित्रता का अर्थ खो गया,
मन मैल से ही भरता है।
धर्म के नाम पर राजनीति,
सच्चाई बस एक कहानी,
भक्ति में भी छल की मिलावट,
आँखों में सबके है पानी।
न्याय की कुर्सी पर बैठा,
खुद ही अन्याय करता है,
गरीब की कोई नहीं सुनता है,
अमीर का पलड़ा भारी रहता है।
ये कैसा विकास है अपना,
जहाँ आत्मा मर रही है?
भीड़ बहुत है शहरों में,
मगर तन्हाई पनप रही है।
रोशनी की आस कहाँ है?
कोई तो राह दिखाओ,
सोए हुए इस ज़मीर को,
अब फिर से आकर जगाओ।
परिवर्तन की लहर उठाओ,
मन को निर्मल आज बनाओ,
दूर करो ये पाप,ये नफ़रत,
एक नया सवेरा फिर से लाओ।
रीना पटले (शिक्षिका)
शास हाई स्कूल ऐरमा (कुरई)
जिला -सिवनी (मध्यप्रदेश)












