
आज की रात नींद मुझसे खफ़ा सी निकली है,
तेरी यादों की चादर फिर भी बिछी-बिछी निकली है।
सोचा तुझसे बात कर लूं, ये दिल बहल जाएगा,
फिर हक़ीक़त की आहट आई — तू ही तो व्यस्त निकली है।
मेरे इक फोन के बाद भी तेरी ख़ामोशी का सफ़र,
घंटों की दूरी तय करके बड़ी मुश्किल से निकली है।
फिर मैंने खुद से ही तेरे बारे में बात छेड़ दी,
ये तन्हाई भी जैसे मेरी हमनशीं बनकर निकली है।
मैं कहता था कि जानता हूँ तुझे हर एक पहलू से,
पर आज ये सच्चाई मेरी सोच से आगे निकली है।
तेरी सूरत नहीं, एक परछाई सी आँखों में थी,
जो हर धड़कन के संग चुपके-चुपके ढली निकली है।
तू मुझमें इस कदर उतरी कि मैं मुझमें रहा ही नहीं,
मेरी पहचान भी अब तेरे रंग में रंगी निकली है।
खुद को ढूंढा तो हर जानिब बस तू ही तू नजर आई,
मेरी “मैं” की कहानी भी तेरी ही दास्तां निकली है।
ये इश्क़ भी क्या अजब है, खोकर भी सुकून देता है,
मेरी हर हार में भी तेरी जीत ही बसी निकली है।
अब अगर मैं नहीं दिखता अपने ही आईने में,
तो क्या हुआ — तेरी आँखों में मेरी रौशनी निकली है।
आर एस लॉस्टम











