
सर चढ़कर अब गर्मी बोले |
सबकी सहनशीलता तोले ||
आँख तरेर दिवाकर कहता |
अब झेलिए आग के गोले ||
युद्ध छिड़ा खाड़ी में भीषण|
संकट में है जन साधारण||
जिसकी लम्बी नाक यहाँ पर |
बढ़ चढ़कर कर रहा आक्रमण ||
बढ़ती खूब युद्ध की गर्मी |
बरस रहे बारूदी शोले |
सर चढ़कर अब गर्मी बोले ||
व्याकुल सब इंसान यहाँ हैं |
पशु पक्षी हैरान जहाँ हैं ||
किसे खबर है यहाँ जीव की |
शांति दूत अब बुद्ध कहाँ है |
कोई करता बात शांति की |
कोई बातों से विष घोले||
सर चढ़कर अब गर्मी बोले ||
लगते सभी खून के प्यासे |
सर्वनाश के घिरे कुहासे ||
धधक रही बदले की ज्वाला |
नेता देते झूठ दिलासे ||
रंग बदलते जैसे गिरगिट |
चंचल मन जैसे है डोले ||
सर चढ़कर अब गर्मी बोले ||
आँखों में अब नीर कहाँ है |
सबके मन अब धीर कहाँ है ||
टूट रहा विश्वास सभी का |
अब पहले से वीर कहाँ हैं ||
लादी जैसे अब बेशर्मी |
कहता समय बनो मत भोले ||
सर चढ़कर अब गर्मी बोले ||
युद्ध तेल को ताप रहा है |
असंतोष अब व्याप रहा है ||
मानव घातक शस्त्र बन रहा |
विकट तबाही नाप रहा है ||
युद्धों में संतोष खोजता |
दृश्य देख लगता है रो ले ||
सर चढ़कर अब गर्मी बोले ||
संतोष नेमा “संतोष”












