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स्त्री का मन है

स्त्री का मन है अनमोल धरोहर,
जिसका मोल न पा सका जगत,
न जाने कितने रंग समेटे,
न जाने कितने भाव।

कभी वो चाँदनी सी कोमल,
कभी धधकती अग्नि की ज्वाला,
सहनशीलता उसका आभूषण,
सपनों से सजती हर इक माला।

हँसते हुए अपने दर्द छिपाती,
हर रिश्ते में खुद को समाती,
मन उसका गहरा, सागर जैसा,
जिसे कोई पूरी तरह न पढ़ पाता।

वो प्रेम का अथाह झरना,
संघर्षों में अडिग पर्वत,
ममता, करुणा, शक्ति, समर्पण,
उसके मन का अद्भुत प्रभाव

डॉ रुपाली गर्ग नारी स्वर
मुंबई महाराष्ट्र

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