
ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा ।
तत्र= उस समय {योगी की}; प्रज्ञा= बुद्धि; ऋतम्भरा= ऋतम्भरा होती है ।
अनुवाद– उस समय योगी की बुद्धि ऋतम्भरा {सत्य को धारण करने वाली} होती है ।
व्याख्या– इस सबीज समाधि में पहुंचकर योगी की बुद्धि ऋतम्भरा हो जाती है– जो वस्तु के सत्य स्वरूप को समझने वाली होती है तथा उसके समस्त संशयों एवं भ्रमों का नाश हो जाता है । सम्प्रज्ञात समाधि के आरम्भ से ही योगी को अनुभव होना आरम्भ हो जाता है । योगी को एक-एक सीढ़ी आगे का ज्ञान होता रहता है जैसे सवितर्क से निर्वितर्क का, निर्वितर्क से सविचार का तथा सविचार से निर्विचार का ज्ञान हो जाता है ।
निर्विचार से उसे आध्यात्म प्रसाद मिलना आरम्भ हो जाता है । आत्मा के आनन्द का स्पष्ट अनुभव होने लगता है । ऐसी निर्मल बुद्धि को ‘ऋतम्भरा’ कहते हैं ।
यह सामान्य बुद्धि के पार की स्थिति है तथा आत्मा से सम्बन्धित है जो आत्मा से सीधी संचालित होती है । पहले यह मन की इच्छाओं तथा वासनाओं से संचालित हो रही थी । पहले यह एक छोटी सी प्रकाश किरण थी जो चेतना का थोड़ा-सा प्रकाश ग्रहण कर थोड़े से क्षेत्र में ही प्रकाश करती थी किन्तु अब यह आत्मा के तीव्र प्रकाश को भी ग्रहण कर सकती है । इसमें उसकी कार्य क्षमता बढ़ जाती है । तथा वह आत्मा से आए हुए अनुभवों को भी ग्रहण एवं प्रकाशित कर सकती है ।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम कर शुक्ल हरिद्वार












