
भोर किरन जब धरा पर आती,
फूलों में मुस्कान सजाती।
ओस-बूंद मोती बन जाती,
पंखुरियों पर छवि झिलमिलाती।
रंग-बिरंगे कोमल तन में,
बसती खुशबू मधुर लगन में।
भँवरे गाते प्रेम तराने,
डाल-डाल झूमे मधुबन में।
गुलाब सिखाए प्रेम निभाना,
कमल कहे कीचड़ में खिल जाना।
चंपा-चमेली गंध लुटाएँ,
जीवन को सुगंधित बनाना।
क्षणभंगुर है इनका जीवन,
फिर भी देते सुख का सावन।
त्याग-भाव से जग महकाएँ,
फूलों सा हो मानव जीवन।
रचनाकार
कौशल












