
साथ अपने वो गुलाबी ठंड की सौगात लाया है,
साल भर का बिछडा़ कोई गोया लौट आया है!
गुनगुनी धूप उसके इश्क की हौले से सहलाती है,
बनके मरहम दुपहरी गर्म की झुलसन को मिटाती है!
नर्म सांसों के कुहसारे लिपट जाते हैं जब मुझसे,
खारिशें जिस्म की सारी सिमट जाती हैं तब मुझसे!
बीते हर एक लम्हे की बातें मुझसे वह करता है,
मन की सिलवटों को खोल फिर से तह करता है!
मसाला चाय अदरक की उसकी बाहों में जो मिल जाए,
महक उसकी लहू के आखरी क़तरे तक में घुल जाए !
सुर्ख सपने गाजरी रंग के वो आंगन में उगाता है,
जानता है शीरा गाजर का मुझको कितना भाता है!!
मेरी खातिर जमा करके वो रखता है कई सौगातें,
संगीत मार्च का, नवंबर का पतझड, जुलाई वाली बरसातें!!
ऐ दिसंबर तू! मेरे माशूक सा मुझे कितना सताता है,
नवंबर बाद मिलता है जनवरी छोड़ जाता है!!
तेरी रूख़सत की सुबह से मिलन की शाम लिखता हूं,
डायरी के अखिर सफ़हे को माहिर नाम लिखता हूं!!
विरेन्द्र जैन माहिर
वड़ोदरा गुजरात












