
श्रुतानुमान प्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् ।
श्रुतानमानप्रज्ञाभ्याम्= श्रवण और अनुमान से होने वाली बुद्धि की अपेक्षा; अन्यविषया= इस बुद्धि का विषय भिन्न है; विशेषार्थत्वात्= क्योंकि यह विशेष अर्थवाली है ।
अनुवाद– श्रुति और अनुमान से होने वाली बुद्धि की अपेक्षा इस बुद्धि का विषय भिन्न है क्योंकि यह विशेष अर्थ वाली है ।
व्याख्या– वेद शास्त्र तथा पुस्तकों के पढ़ने अथवा सुनने से वस्तु का सामान्य जानकारी मिलती है । ऐसी जानकारी पूर्ण सत्य नहीं होती । देखी गई वस्तु में भी भ्रम हो जाता है वह भी पूर्ण सत्य नहीं हो सकती ।
इसी प्रकार अनुमान प्रमाण के आधार पर भी भ्रांति हो सकती है । शास्त्र सुनने से उसे विषय के स्वरूप का जो निश्चय होता है वह ‘श्रुति बुद्धि’ है ।
इसी प्रकार अनुमान से जो वस्तु के स्वरूप का निश्चय होता है वह ‘अनुमान बुद्धि’ है ।
इन दोनों से वस्तु के स्वरूप का सामान्य ज्ञान भी होता है । पूर्ण ज्ञान इनसे नहीं होता । ऐसी बुद्धि इन्द्रियों द्वारा प्राप्त विषयों के ज्ञान को ही ग्रहण करने वाली है सूक्ष्म तथा इन्द्रियातीत ज्ञान जो इन्द्रियों का विषय नहीं है वह उनकी पकड़ से नहीं आता ।
किंतु इस निर्विचार समाधि में यह प्रज्ञा ऋतम्भरा हो जाती है तो यह वस्तु के वास्तविक तथा सत्य स्वरूप को ग्रहण करने वाली हो जाती है ।
यही बुद्धि सबसे श्रेष्ठ मानी जाती है । इसका विषय भी भिन्न है । अब यह सीधी आत्मा से आए हुए अनुभवों को ग्रहण करने वाली हो जाती है । पहले इसमें इतनी शक्ति नहीं थी ।
इसे सामान्य बुद्धि ना कहकर ‘प्रज्ञा’ कहते हैं तथा ऐसा पुरुष ‘प्रज्ञावान’ कहलाता है । इस प्रज्ञा के आने पर ही विवेक जागृत होता है जो सत्यासत्य का निर्णय कर सकता है ।
इस स्थिति में पहुंचे व्यक्ति में नीर-क्षीर विवेक की शक्ति आती है । ऐसा व्यक्ति ही परमहंस कहलाता है ।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार












