
अंतहीन सन्नाटा साथ लिए खड़ा बुढ़ापा,
चेहरे की लकीरें,आंखों की थकावट,
क्या कुछ बयां नहीं कर रही हैं!!
वह संताने, जिन पर प्यार लुटाया, कंधों पर खिलाया, पैरों पैरों चलाया,उनसे प्यार का प्रतिदान
क्यों ही उम्मीद किया?? क्यों नहीं जग की
बातों से सीख लिया?? व्यर्थ ही गर्व किया
” मेरी संताने ऐसी ना होगी” शायद भूल थी मेरी…
या कमी रह गई कहीं परवरिश में?
क्या अनुशासन की छड़ी ढंग से न चलाई??
यह आत्म मंथन, यह शोर करता मन का सन्नाटा,
आंसुओं ने भी बगावत कर दी,
दस तरह के प्रश्न लिए यह वृद्धावस्था,
साये की तरह साथ खड़ी संगिनी,
निराशा की घोर अंधेरे में भी
हाथ थामे रहती है, सिर्फ आंखें ही बातें करती हैं,
रोम रोम से निकलते दुख,खेद पश्चाताप
के मौन चित्कार को सिर्फ वो ही सुनती है।
तब उसकी आंखें बोलती है,
” वृद्धावस्था में पदार्पण करना, अशक्त होना नहीं है!!
अपनी राह हम खुद ढूंढेंगे —हम जिएंगे–
शांति से–“
सुलेखा चटर्जी
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