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गिनती की है सांसे अपनी,इन सांसों का खेल निराला।

   सोचा इस जग में आकर, है
   अद्भुत दुनिया  खेल निराला,
   अलग-अलग सब लोग हैँ यहां,
    है सबका अलग-अलग खेला।

      वास वृहद महलों में जिनके
       छोटा सा था दिल का प्याला।
       निर्धन थे साधारण थे,पर 
        दिल था सोने का सा हाला।

       अलख जगाते जन जन में जो,
        पथ था उनका देखा भाला ।
        मन के  मैले रहे वो "साधु" ,
        प्रवचन देते रोज शिवाला।
       घर की रमनी हमने देखी,
       स्वारथ देखे अपना पहला।
      पुरुष विवाहित भी थे देखे,
       घर थी भार्या, बाहर लैला।

       चार दिनों का जीवन है ये,
      "अमर" नहीं है धरती वाला--
      गिनती की है सांसे अपनी
      इन सांसों का खेल निराला।
               
सुलेखा चटर्जी

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