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मेरी खामोशी

मेरी खामोशी को तुम कमजोरी मत समझना,
ये समंदर है… इसमें तूफान भी सोते हैं।
जो हर बात पर बोल देते हैं, वो खोखले होते हैं,
मैं चुप हूँ… इसलिए मेरे लफ्ज़ मोती होते हैं।

मैंने सारे पुराण पढ़े, पर जवाब मांगे नहीं,
दर्द सहे, पर आहें भरी नहीं।
दुनिया तालियां मांगती है, मैं सन्नाटा मांगता हूँ,
क्योंकि शोर में रिश्ते बनते हैं, खामोशी में पहचाने जाते हैं।

मेरी खामोशी वो मंदिर है,
जहाँ हर सवाल की प्रार्थना होती है।
मेरी खामोशी वो अदालत है,
जहाँ हर जख्म खुद गवाही देता है।

लोग पूछते हैं “बोलते क्यों नहीं?”
अरे… जो बोल कर टूट जाए, वो मैं नहीं।
मैं वो दीवार हूँ जो गिरकर भी आवाज़ नहीं करती,
मैं वो दिया हूँ जो बुझकर भी शिकायत नहीं करता।

हां, कभी-कभी मेरी खामोशी चीखती है,
जब निर्भया जैसी बेटियां रोती हैं।
कभी-कभी मेरी खामोशी ताली बजाती है,
जब कोई गरीब भूखे को रोटी देता है।

इसलिए मेरी खामोशी को पढ़ना सीख लो,
इसमें गीता भी है और गाली भी।
इसमें माफी भी है और फैसला भी।
क्योंकि मैं बोलूंगा तो सिर्फ सच बोलूंगा,
और सच… सबको हजम नहीं होता।

मेरी खामोशी ही मेरी पहचान है,
इसी में मेरा कवि, मेरा व्यंग्य, मेरा भगवान है।

सर्वाधिकार सुरक्षित मौलिक अधिकार एवं अप्रकाशित रचनाएँ

अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि, व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर, नागपुर (महाराष्ट्र)

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