
पुरुषोत्तम रघुनंदनम्, दशरथ–सुकुमार।
कौशल्या–नयनानंद, कैकेयी के प्राण॥
लक्ष्मण-प्रिय आराध्य वे, हनुमत के धनराम।
केवट-तरनहार प्रभु, भक्ति-सुधा-अभिराम॥
सीता संग अरण्य-गमन, वन-वन धर्म निदान।
अडिग तपस्या रूप प्रभु, सत्य-नीति-सम्मान॥
रावण-अहंकार-हरण, बने वन में धाम।
भरत-प्रेम-पश्चाताप, बंधु-भाव श्रीराम॥
निषादराज सुहृद मिले, सरल-समत्व प्रताप।
राजा हो पर जन-सेवक, विनय-धर्म-विलाप॥
त्रैलोक्य-नाथ कृपालु वे, राघव शरनागात।
अखिल-जगत-पालक सदन, मोक्ष-पथ प्रभु दात॥
रावण-घातक मात्र नहीं, उद्धारन के स्वामी।
शत्रु हित भी धर्म मार्ग, दिखलाएँ श्रीरामी॥
अयोध्यानाथ दीनबंधु, भक्त- वात्सल राम।
युग-युग धरे मनुष्य-रूप, धर्म–दीप अविराम॥
त्याग-व्रत-तप-ध्यान-मूर्ति, जीवन-सत्य-प्रकाश।
जग में राम-चरित अमर, जन-मन का विश्वास॥
रघुवीर रघुवंश-रत्न, मर्यादा अवतार।
विश्व-शांति के सारथी, अनंत-अनुपम
राम नाम के महा-मंत्र से, मिटता जग-अंधकार।
भक्ति-दीप जग में जले, बने शुभंकर तार॥
आर एस लॉस्टम












