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ख्वाब

ख्वाब अँधेरों में उगती किरण,
मन में उजियारा भर जाते हैं।
थकी निगाहों को सहलाकर,
दिल में नई रोशनी जगाते हैं।

कभी ये माँ की प्यारी दुआ,
कभी पिता की गहरी आस होते।
बिना पुकारे साथ चलें,
और हर मुश्किल में पास होते।

कभी ये यादों की चिंगारी,
कभी पुरानी तड़प जगाते।
जो खो गए उनसे मिलने को,
मन में चुपके से पुल बनाते।

कभी ये आँसू में ढल जाते,
कभी हँसी की वजह बन जाते।
दिल की अनकही पीड़ाओं को,
शब्द बिना ही कह जाते।

कभी ये खुशबू से महकते,
कभी वीरानों में खो जाते।
फिर भी ये मन को संभाले,
दर्द के ऊपर प्रकाश लगाते।

कभी टूटे मन को कह देते,
“चल अब फिर से शुरुआत कर।”
टूटी उम्मीदों की राख में,
एक नन्हा दीपक प्रकट कर।

जो लोग ख्वाबों पर जीते,
वे कभी अकेले नहीं होते।
हर धड़कन में एक साया,
उनके संग में चलता होता।

कभी ये राहें भटका देते,
कभी सही दिशा दिखाते।
लेकिन मंज़िल उन्हीं को मिलती,
जो गिरकर भी आगे बढ़ जाते।

ख्वाब सिर्फ नींद में नहीं आते,
ये जागते हुए भी खिलते।
जो इन पर यक़ीन कर ले,
वो असंभव को भी संभव कर देते।

और जब जीवन की साँझ उतरे,
सब यादें पीछे छूट जातीं।
तब बस ख्वाब ही मुस्काते,
कहते — “यही ज़िंदगी की असली थाती।”

योगेश गहतोड़ी “यश”
नई दिल्ली – 110059

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